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🌸 ऋष्यशृंग का अंगदेश आगमन तथा शान्ता से विवाह 🌸

जब तपस्या के प्रभाव से सूखा भी हरियाली में बदल गया

 

महान् इक्ष्वाकुवंशी महाराज दशरथ की सभा में उस समय गम्भीरता छाई हुई थी। राजा की आँखों में पुत्र-प्राप्ति की तीव्र आकांक्षा थी, और हृदय में धर्मसम्मत समाधान की खोज। तभी राजा की आज्ञा पाकर सुमंत्र ने हाथ जोड़कर, विनयपूर्वक कहना आरम्भ किया—

“राजन्! जिस प्रकार अंगदेश के राजा रोमपाद ने महातपस्वी ऋष्यशृंग को अपने राज्य में आमंत्रित किया था, वह समस्त प्रसंग मैं यथावत् निवेदन करता हूँ। आप मंत्रियों सहित सावधान होकर सुनें।”

 

🌾 अंगदेश का संकट और उपाय का विचार

उस समय अंगदेश भीषण संकट से गुजर रहा था। वर्षा न होने के कारण भूमि विदीर्ण हो चुकी थी। खेत सूखे पड़े थे, कुएँ और सरोवर जलहीन हो चुके थे। प्रजा भूख, भय और निराशा से व्याकुल थी। पशु मरने लगे थे और यज्ञ, दान, हवन — सब कुछ निष्फल प्रतीत हो रहा था।

राजा रोमपाद दिन-रात चिंता में डूबे रहते थे। तब एक दिन उनके पुरोहित और मंत्रियों ने परामर्श कर राजा से कहा—

“महाराज! यह अकाल साधारण नहीं है। यह किसी महान् तपस्वी के अभाव का संकेत है। यदि कोई महातेजस्वी ब्राह्मण आपके राज्य में निवास करे, तो निश्चय ही देवता प्रसन्न होंगे।”

लम्बे विचार-विमर्श के बाद सभी का ध्यान एक ही नाम पर जाकर ठहरा—

विभाण्डक मुनि के पुत्र, महातपस्वी ऋष्यशृंग।

 

🌿 ऋष्यशृंग का जीवन और उनका अनूठा ब्रह्मचर्य

ऋष्यशृंग मुनि जन्म से ही वन में पले-बढ़े थे। उनके पिता विभाण्डक ऋषि अत्यन्त कठोर तपस्वी थे। उन्होंने अपने पुत्र को संसार से पूर्णतः दूर रखा था।

ऋष्यशृंग ने—

  • न कभी स्त्री का मुख देखा था
  • न नगर, ग्राम या राजमहल का
  • न आभूषण, न संगीत, न स्वादिष्ट व्यंजन

उनका सम्पूर्ण संसार था—

  • वेदपाठ
  • अग्निहोत्र
  • पितृसेवा
  • और कठोर तपस्या

वे विषय-वासनाओं के नाम से भी अपरिचित थे।

 

🧠 मंत्रियों की योजना

पुरोहितों ने राजा रोमपाद से कहा—

“महाराज! ऋष्यशृंग को बलपूर्वक लाना अधर्म होगा। परन्तु वे विषयों से अनभिज्ञ हैं। यदि नगर के आकर्षणों द्वारा उन्हें आमंत्रित किया जाए, तो वे स्वयं ही यहाँ आ सकते हैं।”

राजा ने धर्मसंकट में पड़ते हुए भी प्रजा के हित हेतु अनुमति दी।

 

🌸 वन में प्रथम साक्षात्कार

नगर की सुन्दर स्त्रियाँ, आभूषणों और मधुर वाणी से सुसज्जित होकर वन में पहुँचीं। वे मुनि के आश्रम से कुछ दूरी पर ठहर गईं।

एक दिन ऋष्यशृंग भ्रमण करते हुए वहाँ पहुँचे।

उन्होंने जो देखा—

  • अलौकिक सौन्दर्य
  • मधुर गीत
  • स्नेह से भरी दृष्टि

यह सब उनके लिए पूर्णतः नवीन था।

उनका सरल हृदय सहज ही आकर्षित हो गया।

 

🏡 आश्रम में अतिथि-पूजन

ऋष्यशृंग ने उन्हें देवतुल्य समझकर आश्रम बुलाया।

वहाँ उन्होंने कहा—

“यह अर्घ्य है, यह पाद्य है, यह फल-मूल भोजन के लिए है।”

उन्होंने विधिपूर्वक पूजन किया।

स्त्रियों ने उन्हें ऐसे व्यंजन दिए जिनका स्वाद उन्होंने पहले कभी नहीं चखा। उन्होंने उन्हें भी “फल” ही समझा।

 

💔 विरह की प्रथम अनुभूति

स्त्रियों के जाने के बाद ऋष्यशृंग का मन व्याकुल हो उठा।

यह था—

👉 विरह का पहला अनुभव

👉 चित्त का पहला कम्पन

रातभर वे विचलित रहे।

 

🚶‍♂️ अंगदेश की ओर प्रस्थान

अगले दिन वे स्वयं उसी स्थान पर पहुँचे। अवसर पाकर स्त्रियाँ उन्हें अपने “आश्रम” चलने का निमंत्रण देकर अंगदेश ले आईं।

 

🌧️ तप का चमत्कार

जैसे ही ऋष्यशृंग ने अंगदेश की सीमा में प्रवेश किया—

☁️ आकाश में मेघ घिर आए

🌧️ मूसलाधार वर्षा होने लगी

🌾 धरती हरियाली से भर उठी

राजा रोमपाद समझ गए—

देवता प्रसन्न हो चुके हैं।

 

👑 शान्ता से विवाह

राजा ने साष्टांग प्रणाम कर, अत्यन्त विनय से ऋष्यशृंग का स्वागत किया और अपनी कन्या शान्ता का विधिपूर्वक विवाह उनके साथ कर दिया।

शान्ता—

  • सौम्य
  • धर्मनिष्ठ
  • पतिव्रता थीं।

 

🌼 समापन

ऋष्यशृंग शान्ता के साथ अंगदेश में रहने लगे। राज्य समृद्ध हो गया। अकाल समाप्त हुआ। धर्म की पुनः स्थापना हुई।

 

🌺 गूढ़ संदेश

यह प्रसंग सिखाता है—

  • तपस्या का प्रभाव केवल आत्मा पर नहीं, प्रकृति पर भी पड़ता है
  • निष्कलुष मन सरल होता है, पर उसका सम्मान आवश्यक है
  • राजा का कर्तव्य प्रजा-कल्याण है, पर धर्म की मर्यादा के साथ