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(56)
क्षत्रिय गर्व और ब्रह्मतेज का संघर्ष
जब महर्षि वसिष्ठ ने दृढ़ और सत्य से भरे वचन कहे, तो विश्वामित्र का क्षत्रिय-स्वभाव तुरंत प्रज्वलित हो उठा। उनके भीतर का गर्व और क्रोध जैसे एक साथ फूट पड़ा। बिना एक क्षण की भी देरी किये उन्होंने आग्नेयास्त्र उठा लिया और क्रोध से भरी आवाज़ में ललकारते हुए आगे बढ़े—मानो वे अपने अपमान का उत्तर अभी और इसी क्षण देना चाहते हों।
किन्तु वसिष्ठजी विचलित नहीं हुए। वे उसी स्थान पर अडिग खड़े रहे—शांत, गंभीर और दिव्य तेज से युक्त। उन्होंने अपने हाथ में ब्रह्मदण्ड उठा लिया, जो उस समय मानो द्वितीय कालदण्ड के समान भयंकर प्रतीत हो रहा था। उनके शब्दों में कठोरता थी, पर वह केवल सत्य का प्रतिबिंब था। उन्होंने विश्वामित्र को उनके क्षत्रिय-अभिमान के साथ चुनौती दी—कि वे अपना सारा बल दिखा दें और ब्रह्मबल की वास्तविकता को देख लें।
विश्वामित्र ने बिना रुके अपना पहला अस्त्र छोड़ा—आग्नेयास्त्र। वह अत्यंत भयंकर था, पर जैसे ही वह वसिष्ठजी के समीप पहुँचा, उनके ब्रह्मदण्ड के प्रभाव से उसी प्रकार शांत हो गया जैसे प्रचंड अग्नि जल के स्पर्श से बुझ जाती है। यह दृश्य असाधारण था, पर विश्वामित्र का क्रोध शांत होने वाला नहीं था।
उन्होंने एक के बाद एक अनेक दिव्य अस्त्रों का प्रयोग प्रारम्भ कर दिया—वारुण, रौद्र, ऐन्द्र, पाशुपत, और ऐषीक। इसके बाद भी वे नहीं रुके। मानव, मोहन, गान्धर्व, स्वापन, जृम्भण, मादन, संतापन, विलापन, शोषण, विदारण, वज्र, ब्रह्मपाश, कालपाश, वारुणपाश, पिनाकास्त्र, अशनि, दण्डास्त्र, पैशाचास्त्र, क्रौञ्चास्त्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र, वायव्यास्त्र, मन्थनास्त्र, हयशिरा, शक्तियाँ, कंकाल, मूसल, वैद्याधरास्त्र, कालास्त्र, त्रिशूलास्त्र, कापालास्त्र और कङ्कणास्त्र—मानो सम्पूर्ण अस्त्र-विद्या एक ही स्थान पर उमड़ पड़ी हो।
आकाश, पृथ्वी और दिशाएँ उस अद्भुत युद्ध की साक्षी बन गईं। ऐसा प्रतीत होता था जैसे प्रलय का दृश्य उपस्थित हो गया हो। परंतु उस भयंकर प्रहार के बीच वसिष्ठजी की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया। वे शांत भाव से खड़े रहे और अपने ब्रह्मदण्ड के माध्यम से उन सभी अस्त्रों को निष्फल करते रहे। यह एक अलौकिक दृश्य था—जहाँ असंख्य अस्त्रों की शक्ति एक मात्र ब्रह्मतेज के सामने असहाय हो रही थी।
जब सारे अस्त्र व्यर्थ हो गये, तब विश्वामित्र ने अत्यंत क्रोधित होकर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। उसके उठते ही तीनों लोकों में भय व्याप्त हो गया। देवता, ऋषि, गन्धर्व और नाग—सभी उस महाशक्ति को देखकर विचलित हो उठे। वातावरण काँप उठा, जैसे सम्पूर्ण सृष्टि संकट में हो।
किन्तु वसिष्ठजी ने अपने ब्रह्मतेज के प्रभाव से उस ब्रह्मास्त्र को भी ब्रह्मदण्ड द्वारा शांत कर दिया। उस समय उनका स्वरूप अत्यंत रौद्र हो गया। उनके शरीर के प्रत्येक रोमकूप से धुएँ और अग्नि की लपटें निकलने लगीं। उनके हाथ में उठाया हुआ ब्रह्मदण्ड धूमरहित कालाग्नि की भाँति प्रज्वलित हो रहा था। उनका वह रूप इतना भयानक और प्रभावशाली था कि तीनों लोक मानो मोह और भय में डूब गये।
यह दृश्य देखकर समस्त मुनिगण घबरा उठे। वे वसिष्ठजी की स्तुति करते हुए विनती करने लगे—कि वे अपने तेज को समेट लें, क्योंकि उनका यह अपार बल अब सम्पूर्ण जगत के लिये असहनीय हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि विश्वामित्र पराजित हो चुके हैं, अब इस रौद्र रूप की आवश्यकता नहीं है।
मुनियों की प्रार्थना सुनकर वसिष्ठजी का क्रोध शांत हो गया। उनका तेज पुनः संयमित हो गया और वातावरण में शांति लौट आई।
उधर विश्वामित्र, जो अभी तक युद्ध में डटे हुए थे, अब गहरी श्वास लेते हुए खड़े थे। उनके भीतर कुछ बदल चुका था। उन्होंने अपनी पराजय को स्वीकार करते हुए कहा कि क्षत्रियबल धिक्कार योग्य है, क्योंकि सच्चा बल तो ब्रह्मतेज ही है। उन्होंने स्वयं अनुभव कर लिया था कि एक ब्रह्मदण्ड ने उनके समस्त अस्त्रों को निष्फल कर दिया।
उस क्षण उनके हृदय में एक नया संकल्प उत्पन्न हुआ। उन्होंने निश्चय किया कि वे अपने मन और इन्द्रियों को शुद्ध करेंगे और उस महान तपस्या का मार्ग अपनाएँगे, जो उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति कराएगा।
इस प्रकार यह घटना केवल एक युद्ध का अंत नहीं थी, बल्कि एक महान परिवर्तन की शुरुआत थी—जहाँ पराजय ने ही विश्वामित्र को उनके जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य की ओर अग्रसर किया।