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दिति का करुण हृदय और मरुद्गणों की दिव्य उत्पत्ति
बहुत प्राचीन समय की बात है। एक दिन जब देवराज इन्द्र ने दिति के गर्भ को सात भागों में विभाजित कर दिया, तब दिति का हृदय असहनीय दुःख से भर उठा। वह एक माँ थीं, जिनके गर्भ में पल रहे पुत्रों के साथ ऐसा हुआ था। उनका मन पीड़ा से व्याकुल हो उठा। आँखों में आँसू भरकर वे अत्यन्त विनम्रता के साथ वीर और तेजस्वी सहस्राक्ष इन्द्र के सामने खड़ी हो गईं। उनके स्वर में दुःख भी था, करुणा भी थी और एक माँ का ममत्व भी।
दिति ने इन्द्र से कहा कि इस घटना के लिए वे उन्हें दोष नहीं देतीं। उन्होंने स्वीकार किया कि जो कुछ हुआ है, वह उनके अपने ही अपराध का परिणाम है। उन्होंने बड़े शांत और विनीत भाव से कहा कि उनके गर्भ के सात टुकड़े हो जाने में इन्द्र का कोई दोष नहीं है। यह सब उनके ही कर्मों का फल है।
इसके बाद दिति ने एक अत्यन्त उदार और अद्भुत विचार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि भले ही यह कार्य बाहर से देखने पर क्रूर प्रतीत होता हो, पर वे चाहती हैं कि इसका परिणाम अंततः शुभ और सुखद बने। वे चाहती थीं कि जिस गर्भ को नष्ट किया गया है, वही सात भाग अलग-अलग दिव्य रूप धारण कर लें। वे सातों खण्ड सात महान दिव्य व्यक्तियों के रूप में उत्पन्न हों और आगे चलकर मरुद्गणों के स्थानों की रक्षा और पालन करने वाले देवता बन जाएँ।
एक माँ का हृदय कितना विशाल हो सकता है, यह दिति के इन शब्दों से स्पष्ट हो रहा था। उन्होंने प्रेम से कहा कि उनके ये पुत्र दिव्य स्वरूप धारण करेंगे और ‘मारुत’ नाम से प्रसिद्ध होंगे। वे आकाश में विचरण करेंगे और वहाँ स्थित सात महान वायु-मंडलों में अपनी शक्ति और गति से संसार का संचालन करेंगे।
दिति ने आगे समझाया कि ये केवल सात ही नहीं होंगे, बल्कि प्रत्येक के साथ सात-सात का एक समूह होगा। इस प्रकार कुल मिलाकर उनचास मरुत् माने जाएँगे। उन्होंने कल्पना की कि उनमें से एक समूह ब्रह्मलोक में विचरेगा, दूसरा इन्द्रलोक में और तीसरा दिव्य वायु के रूप में आकाश के मध्य भाग में गति करेगा। उनकी उपस्थिति से सम्पूर्ण आकाश जीवंत और शक्तिशाली बना रहेगा।
उन्होंने बड़े प्रेम और आशीर्वाद भरे स्वर में इन्द्र से कहा कि उनके शेष चार समूह भी उनकी आज्ञा से समय-समय पर समस्त दिशाओं में विचरण करेंगे और संसार में वायु की शक्ति को फैलाएँगे। दिति ने यह भी स्मरण कराया कि जब इन्द्र ने गर्भ के टुकड़ों को रोने से रोकने के लिए “मा रुदः” कहा था—अर्थात् “रोओ मत”—उसी वाक्य से उनका नाम ‘मारुत’ पड़ जाएगा। यही नाम उन्हें संसार में प्रसिद्ध करेगा।
दिति की यह करुणा और उदारता सुनकर इन्द्र का हृदय भी द्रवित हो गया। वे हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्रता से बोले कि हे माता, आपका कल्याण हो। आपने जो कुछ कहा है, वह सब वैसा ही होगा। आपके ये पुत्र देवस्वरूप होकर लोकों में विचरण करेंगे और देवताओं के समान सम्मान पाएँगे।
इस प्रकार उस तपोवन में माँ और पुत्र के बीच एक नया और पवित्र संकल्प जन्मा। दिति और इन्द्र दोनों का मन संतोष से भर गया। ऐसा कहा जाता है कि इसके बाद वे दोनों कृतार्थ होकर स्वर्गलोक को चले गये।
महर्षि विश्वामित्र ने जब यह कथा सुनाई, तो उन्होंने यह भी बताया कि यही वह पवित्र स्थान है जहाँ कभी देवराज इन्द्र ने तपस्विनी दिति की सेवा की थी। उस स्थान की स्मृति आज भी दिव्य और पवित्र मानी जाती है।
फिर विश्वामित्र ने उस प्रदेश का एक और इतिहास सुनाया। उन्होंने बताया कि बहुत समय पहले महाराज इक्ष्वाकु के एक अत्यन्त धर्मात्मा पुत्र थे, जिनका नाम विशाल था। उनकी माता का नाम अलम्बुषा था। विशाल एक महान और पराक्रमी राजा थे। उन्होंने उसी पवित्र भूमि पर एक सुंदर और समृद्ध नगरी बसाई, जिसका नाम ‘विशाला’ पड़ा।
राजा विशाल के पुत्र का नाम हेमचन्द्र था। वह अत्यन्त बलवान और वीर थे। उनके बाद उनके पुत्र सुचन्द्र हुए, जो अपने यश और तेज के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे।
समय बीतता गया और इस वंश की परंपरा आगे बढ़ती रही। सुचन्द्र के पुत्र धूम्राश्व हुए और धूम्राश्व के पुत्र सृंजय। इन राजाओं ने भी अपने पूर्वजों की तरह धर्म और पराक्रम से राज्य को संभाला।
सृंजय के पुत्र सहदेव हुए। सहदेव भी महान प्रतापी और धर्मनिष्ठ राजा थे। उनके पुत्र का नाम कुशाश्व था, जो अत्यन्त धर्मात्मा और तेजस्वी थे।
कुशाश्व के पुत्र सोमदत्त हुए, जो अपने प्रताप और तेज के लिए विख्यात थे। सोमदत्त के पुत्र काकुत्स्थ कहलाए, जिन्होंने भी अपने पूर्वजों की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया।
काकुत्स्थ के पुत्र सुमति नाम से प्रसिद्ध हुए। वे अत्यन्त तेजस्वी, सुंदर और दुर्जय वीर थे। उसी समय वे विशाला नगरी में निवास कर रहे थे और अपने राज्य का संचालन कर रहे थे।
विश्वामित्र ने यह भी बताया कि महाराज इक्ष्वाकु की कृपा से इस वंश के सभी राजा दीर्घायु, महान आत्मा, पराक्रमी और धर्मपरायण होते आये हैं। उनकी कीर्ति और धर्मनिष्ठा ने इस भूमि को पवित्र और समृद्ध बनाया।
फिर उन्होंने श्रीराम से स्नेहपूर्वक कहा कि आज की रात वे सब इसी पवित्र नगरी में विश्राम करेंगे। यहाँ विशाला की शांत और सुखद भूमि पर रात बिताने के बाद अगली सुबह वे यात्रा आगे बढ़ाएँगे और मिथिला पहुँचकर राजा जनक के दर्शन करेंगे।
उधर जब विशाला के महान राजा सुमति को यह समाचार मिला कि महान तपस्वी विश्वामित्र अपनी शिष्यमंडली के साथ उनकी नगरी के समीप आ पहुँचे हैं, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने स्वयं आगे बढ़कर उनका स्वागत करने का निश्चय किया।
राजा अपने पुरोहितों और परिजनों के साथ नगर से बाहर आये। उन्होंने श्रद्धा और सम्मान के साथ विश्वामित्र की पूजा की। उनके सामने हाथ जोड़कर विनम्रता से उनका कुशल-क्षेम पूछा। उनके चेहरे पर आदर और प्रसन्नता झलक रही थी।
राजा सुमति ने अत्यन्त विनीत भाव से कहा कि आज वे स्वयं को अत्यन्त भाग्यशाली और धन्य मानते हैं। उन्होंने कहा कि मुनिवर का उनके राज्य में पधारना उनके लिए महान अनुग्रह है। उन्होंने भावुक होकर कहा कि इस समय उनसे अधिक भाग्यशाली व्यक्ति संसार में कोई नहीं होगा, क्योंकि उन्हें इतने महान ऋषि के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
इस प्रकार उस पवित्र भूमि पर करुणा, धर्म, परंपरा और सम्मान की एक अद्भुत कथा जीवंत हो उठी—जहाँ एक माँ की करुणा से मरुद्गणों का जन्म हुआ और जहाँ महान राजाओं की धर्मपरायण परंपरा ने उस भूमि को सदैव गौरवपूर्ण बना दिया। ✨