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🌸 पुत्रकामना और धर्म का संकल्प

राजा दशरथ का अश्वमेध यज्ञ

 

अयोध्या के प्रतापी नरेश महाराज दशरथ समस्त धर्मों के ज्ञाता, न्यायप्रिय और प्रजावत्सल राजा थे। उनका राज्य वैभव, ऐश्वर्य और सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण था, परंतु उनके हृदय में एक ऐसा अभाव था जो समस्त राजवैभव को भी फीका कर देता था—पुत्रहीनता।

राजा दशरथ के पास सब कुछ था, किंतु वंश को आगे बढ़ाने वाला उत्तराधिकारी नहीं। यही चिंता दिन-रात उनके मन को व्याकुल किए रहती थी। राज्य, ऐश्वर्य और यश—इन सबसे उन्हें तब तक पूर्ण सुख नहीं मिलता था, जब तक उन्हें पुत्रप्राप्ति की आशा नहीं होती।

एक दिन गहन चिंतन करते हुए उनके मन में एक पवित्र विचार उत्पन्न हुआ—

“मैं पुत्रप्राप्ति के लिए अश्वमेध यज्ञ क्यों न करूँ?”

यह विचार उन्होंने बिना परामर्श के नहीं अपनाया। धर्मात्मा राजा ने अपने शुद्ध बुद्धि वाले मंत्रियों के साथ गंभीर विचार-विमर्श किया और यज्ञ करने का निश्चय दृढ़ किया। तत्पश्चात उन्होंने अपने विश्वस्त मंत्री सुमंत्र को आज्ञा दी कि वे समस्त गुरुजनों और श्रेष्ठ पुरोहितों को शीघ्र बुलाएँ।

सुमंत्र ने तत्परता से वेदविद्या में पारंगत महर्षियों को आमंत्रित किया। शीघ्र ही वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, सुयज्ञ तथा अन्य श्रेष्ठ ब्राह्मण सभा में उपस्थित हुए। राजा दशरथ ने विधिपूर्वक उनका पूजन किया और विनम्र स्वर में अपनी व्यथा प्रकट की—

“महर्षियो! पुत्र के बिना मुझे न राज्य में सुख है, न जीवन में शांति। अतः मैं शास्त्रोक्त विधि से अश्वमेध यज्ञ कर भगवान की आराधना करना चाहता हूँ। कृपा कर बताइए कि यह यज्ञ किस प्रकार सफल होगा।”

राजा की पवित्र भावना और विनय देखकर सभी ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने एक स्वर में कहा—

“बहुत उत्तम विचार है, महाराज!”

उन्होंने यज्ञ की संपूर्ण प्रक्रिया बताई—

यज्ञ सामग्री का संग्रह हो,

अश्व को भूमंडल में विचरण हेतु छोड़ा जाए,

सरयू नदी के उत्तर तट पर यज्ञभूमि का निर्माण हो,

और समस्त क्रियाएँ शास्त्रानुसार हों।

महर्षियों ने आशीर्वाद दिया कि धर्मपूर्वक किए गए इस यज्ञ से राजा को निश्चित ही पुत्रप्राप्ति होगी, क्योंकि उनकी इच्छा पूर्णतः धर्मयुक्त है।

यह सुनकर राजा दशरथ का हृदय आनंद से भर गया। उनकी आँखों में आशा की चमक आ गई। उन्होंने मंत्रियों को आदेश दिया कि यज्ञ की प्रत्येक व्यवस्था पूर्ण सावधानी से की जाए, क्योंकि विधिहीन यज्ञ विनाश का कारण बन सकता है और विद्वान ब्रह्मराक्षस यज्ञ में दोष ढूँढ़ते रहते हैं।

सभी मंत्रियों ने एक स्वर में आज्ञा स्वीकार की—

“जैसा आदेश, महाराज!”

ब्राह्मणों को सम्मानपूर्वक विदा करने के बाद राजा ने अपने महल में जाकर रानियों से कहा—

“देवियो! दीक्षा ग्रहण करो। मैं पुत्रप्राप्ति के लिए यज्ञ करने जा रहा हूँ।”

यह सुनते ही रानियों के मुख ऐसे खिल उठे जैसे वसंत में कमल खिलते हैं। आशा, श्रद्धा और आनंद से उनका हृदय भर उठा।

 

🪔 भावार्थ एवं दार्शनिक व्याख्या (Explanation)

यह प्रसंग केवल पुत्रप्राप्ति की कथा नहीं है, बल्कि धर्म, मर्यादा और उत्तरदायित्व का आदर्श चित्रण है। राजा दशरथ चाहते तो अपनी शक्ति या अहंकार के बल पर कोई भी निर्णय ले सकते थे, किंतु उन्होंने—

  • गुरुजनों का मार्गदर्शन लिया
  • शास्त्रसम्मत विधि अपनाई
  • व्यक्तिगत इच्छा को धर्म से जोड़ा

यह दर्शाता है कि सच्चा राजा वही है जो इच्छा को भी धर्म के अधीन रखे।

 

🌼 नीति (Moral / संदेश)

1. धर्मयुक्त इच्छा कभी निष्फल नहीं होती।

जो काम शुद्ध भावना और शास्त्रीय मर्यादा से किया जाए, उसमें ईश्वर की कृपा अवश्य होती है।

2. गुरु और विद्वानों का मार्गदर्शन जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा है।

स्वेच्छाचार विनाश लाता है, पर परामर्श सफलता।

3. साध्य से अधिक साधन की पवित्रता आवश्यक है।

विधि से किया गया कर्म ही फलदायी होता है।

4. सच्चा नेतृत्व विनम्रता से जन्म लेता है, अहंकार से नहीं।