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चतुर्थ स्कंध
श्लोक
ओम् अक्षस्त्रक्परशुं, गदेषुकुलिशं, पदम् धनुष्कुण्डिका
दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलज घण्टां सुराभाजनम्
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां
सेवे सैरिभमर्दिमिह महालक्ष्मी सरोजस्थिताम्
भावार्थ
मैं कमल के आसन पर बैठी हुई प्रसन्न मुख वाली महिषासुर मर्दिनी भगवती महालक्ष्मी का भजन करता हूं जो हाथों में अक्षमाला, फरसा, गदा, बाण, बज्र, पद्म, धनुष, कुंडिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, शंख, घण्टा, मधुपात्र, शूल, पास और चक्र धारण करती है।
-दोहा-
श्री गणपतिजी के सामने, बैठा हूं कर जोड़
रिद्धि सिद्धि शुभ लाभ धणी, कलम बिराजो मोर -40
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
आग्रेय नगरी अति सुहानी लक्ष्मी कृपा प्रकृति मुस्कानी
नगरी की जब करी स्थापना, महोत्सव किया सभी मन भावना
दूर दूर से मनुज पधारे, अग्रसेन जी ने सभी संभारे
प्रतापपुर से भी कुछ आये, उन्हें देख राजा हरषाये
कुशलक्षेम की बातां पूछी, मात भ्रात की बातां पूछी
सुनकर सभी उदासी छाई, कहने लगे सुनो गौसाई
कुंदन सेन से दुखी है सारे, विपदा में हम बने दुखियारे
आपकी माता आपका भाई, राज छोड़ गुरु संग में जाई
कहां गए कुछ नहीं है पताई, आप करों अब हमरी सहाई
-सोरठा-
सुन दुखी प्रजा के बेन, अग्रसेन कहने लगे
धीरज धारण कीजिए, ईश्वर करे सहायता -41 क
-सोरठा-
विदा किये नर नारी, शीश झुका सम्मान कर
मात भ्रात की याद, मन से दूर न कर सके -41 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से. मानवता के बने पुजारी
महाराज ने मन में विचारी, सहायता करें भू देव हमारी
विप्र वंश को तुरंत बुलाया, धन सम्मान देय बतलाया
मेरा अनुज व मात भगवती, इनको ढूंढो आप सब जाहि
दसों दिशा ब्राह्मण पठाये, खोजन चले सभी हर्षाये
राज्य प्रबंध मर्यादित किन्हा, नीति निपुण को बड़ा पद दीन्हा
गर्ग मुनि धर्म के ज्ञाता, शुभ आशीष देय समझाता
महामुनि एक दिन थे आये, पाय पखार राजा बैठाये
कहने लगे गर्ग मुनि ज्ञानी, राजा को भविष्य की वाणी
गृहस्थ धर्म की करो तैयारी, नाग लोक की राजकुमारी
नाम माधवी सुन्दर नाम, है वह सभी गुणों की खान
नाग लोक है तुम को जाना, उसको वर कर घर है लाना
उद्दालक मुनि करें सहाई, महालक्ष्मी बने सुखदाई
-दोहा-
शीश झुका आशीष ले, गुरु आज्ञा को मान
चले अग्रसेन महामती, करने सफल अभियान -42 क
-दोहा-
तल अतल वितल सुतल, सबको करके पार
पाताल लोक में पहुंचे हैं, लोहित नदी कर पार -42 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
लोहित नदी के तट पे आये, देख आश्रम अति हर्षाये
उद्दालक को किया प्रणाम, ऋषि ने भी किया सम्मान
अग्रसेन ने बात बतायी, गर्ग मुनि की कही सुनाई
उद्दालक ऋषि कहने लागे, राजकुमार भाग्य है जागे
नाग लोक के राजा महीधर, उनको हराना कभी न संभव
केवल बुद्धि का है सहारा, शिव का आशीर्वाद तुम्हारा
उद्दालक को किन्ही प्रणामी, आगे चले पृथ्वी के मानी
लोहित नदी में स्नान है कीन्हा, निकट ही शिव लिंग को चीन्हा
-दोहा-
हाटकेश्वरम के दर्शन कर, मन में लेकर आस
करने लगें विश्राम वहीं, खूब था मन विश्वास -43
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
नाग राज महीधर थे ज्ञानी, नागेंद्री उनकी महारानी
उनके एक कन्या थी प्यारी, नाम माधवी सुन्दर भारी
शुभ गुण सुन्दर धर्म परायण, दया धर्म था मन में पावन
युवा अवस्था उसने धारी, महीधर ने विवाह की विचारी
कन्या से वह पूछन लागे, कैसा वर तुम्हे अच्छा लागे
कहने लगी माधवी प्यारी, नागों में नहीं रुचि हमारी
देवराज भी नहीं मन भाये, मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ बताये
-दोहा-
अपनी पसंद बताय कर, घिरी सहेलियां माय
आयी उपवन के अंदर, देख फूल हर्षाये -44 क
-दोहा-
उसी समय उस बाग में, देवराज थे आये
सुन्दर कन्या देखकर, मन ही मन हर्षाये -44 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
माधवी से बोले सुरसाई, कन्या मुझे पसंद तू आयी
मैं हूं इंद्र देवों का राजा, सकल मनोरथ पूरन काजा
तुम्हे देख मन में है आयी, रानी तुम बनो सुरराई
सुनकर देवराज की बानी, कहने लगी माधवी सयानी
देव वरण की इच्छा नाहिं, माफ करो मुझको तुम ज्ञानी
कुपित हो इंद्र पठाये, पास सरोवर सभी नहाये
क्रीड़ा करे कन्या बहुभांति, देख प्रकृति मन हरषाती
-दोहा-
उसी समय घटना घटी, बड़ी अजब महान
देख माधवी चकित भयी, ईश्वर की गति जान -45
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
क्रीड़ा जहां कर रही नृप बाला, सुन्दर सरोवर बहुत विशाला
अचानक सुनी जोर की बानी, गाय सांड बछड़े बहुमानी
घेर लिया सरोवर सारा, रम्भा रहे विकल भय मारा
घोर नाद करता सिंह आया उसको देख सकल भय छाया
निकट विश्राम अग्रसेन करहिं, सुनकर घोर शब्द न डरहिं
तुरंत दया कर वहां पर आये गौ वंश नाग कन्या भय खाये
पीड़ित देख हृदय भर आया, तुरंत उपाए करन को धाया
बाण चला एक घेरा कीन्हा, सिंह को बंद घेर में लीन्हा
भय से मुक्त हुए सब प्राणी, नाग कन्या मन में हरषानी
अग्रसेन की देख मानवता, माधवी मन हर्ष अधिकता
हुई अभिभूत निहारण लागि, जैसे रमा विष्णु मन लागि
दोनों के मन में हुई है इच्छा, आपस में मिलन की शिक्षा
देख माधवी अग्र विचारी, नाग सुता अति सुन्दर प्यारी
माधवी मन हर्ष अपारा, पार्वती मंदिर पग धारा
कीन्ह अर्चना मात भवानी, माता ने भी की सन्मानि
प्रार्थना
मन जाहि राच्यो मिलहिं सो वर सहज सुंदर सांवरो
करुणा निधान सुजान शील सनेह जानत रावरो
एहिं भांति गौरी अशीष सुनि सिय सहित हिय हर्षित अली
तुलसी भवानी पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली
-दोहा-
माधवी मन हर्ष अति, हो रहे गाल गुलाबी
अग्रसेन छवि हृदय धर, पहुंची महलां माय -46 क
-दोहा-
नागाधिपति महीधर के, गुपचर फिरे वन माहि
देख अग्र माधवी प्रसंग, तुरंत किया है बखानी -46 ख
-सोरठा-
सुनकर गुप्तचर की वाणी महीधर सेनापति कहयो
तुरंत करो गिरफ्तार, किसकी हिम्म्मत बढ़ रही -46 ग
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
सुनकर नागराज आदेशा, सेनापति चित्रांग विशेषा
चले क्रुद्ध होकर के धाये, अग्रसेन के निकट थे आये
टूट पड़े सकल विषैले, हुई गर्जना लगा महि डोले
अग्रसेन तलवार निकाली, कुपित होय धावा बलशाली
सेनापति चित्रांग भी भारी, बलशाली लगते भयकारी
दोनों योद्धा जूझे रण माहि, विजय नहीं किसी ने पायी
चित्रांग ने फेरी माया, अग्रसेन को बंदी बनाया
महीधर भवन निकट सब आये, अग्रसेन को जेल पठाये
घोर रात्रि बिन नींद बिताई, गुरुवाणी पर ध्यान लगाई
भुवन भास्कर याद थे आए, स्तवन से सब कष्ट मिटाए
नागपास से मुक्त कर दिया, अग्रसेन के कष्ट को हर लिया
-दोहा-
उधर माधवी दुखी थी, सुन्न पड़े सबगात
मां नागेन्द्री पूछन लागि, पुत्री के मन की बात -47 क
-दोहा-
झिझक झिझक कर कह रही, पुत्री मन की बात
जब से देखा पुरुष सिंह, और न कुछ भी सुहात -47 ख
-दोहा-
सुन पुत्री की कामना, पहुंची पति के पास
नागेन्द्री कहने लगी, नागराज से खास - 47 ग
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
नागेंद्री पति निकट है आयी, आकर मन की बात बतायी
कहने लगे महीधर राजा, बच्ची है समझ नहीं ज्यादा
देवराज उसे वरन में चाहते, बैर नहीं उनसे कर पाते
वह मानव भी होगा दुखाई, यदि हमने किन्ही ढिढाई
सुनकर पति परमेश्वर वाणी, क्रोधित हो बोली महारानी
हम भी हैं शिवभक्त गौसाईं, झूठे डर से नहीं डर जाईं
उधर माधवी मन में बिचारे, उमा महेश्वर मन से पुकारे
पार्वती शिव शरण में आयी, अपनी विपदा उनको सुनायी
प्रार्थना
हे महेश काटो कलेश, मैं शरण में थारी आयी हूं
जब तक मन की आस न पूरो, शीश चरण से न ठाई हूं
मातु पार्वती करो कृपा, मैं चरणन की दासी हूं
एक आस विश्वास लिए मां, पास तुम्हारे आयी हूं
-सोरठा-
सुनकर मन की बात, शिव पार्वती प्रसन्न हुए
प्रकटे मंदिर माय, मनवांछित वर दे दिये -48
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
मन प्रसन्न हृदय सुख आया, माधवी का मन हरषाया
उधर महीधर मन में विचारे, आगे की करनी मन धारे
उसी समय समाचार है आया, अग्रसेन ने मुक्ति पाया
सुनकर बहुत आश्चर्य कीन्हा, नाग मंत्री से मंत्रणा कीन्हा
दोनों तरफ है विपत्ति भारी, सब मिलकर करो विचारी
तभी नागाचार्य वहां आये, विवश नागों को देख बताये
ज्ञान देय तमको हर लिन्हा, देव दण्ड का भय हर लिन्हा
नाग समाज प्रसन्न था भारी, नाग गुरु ने विपत्ति बिसारी
इतने अग्रसेन वहां आये, तेज रूप नागों मन भाये
महीधर को प्रणाम है कीन्हा, राजा ने उचित आसन दीन्हा
पूछन लगा नाग समुदाये, कौन हो तुम कहां से आये
-दोहा-
हाथ जोड़ कहने लगे, अग्रसेन है नाम
सूर्य कुल में जन्म लिया है, बल्लभसेन सुत जान -49 क
-दोहा-
महालक्ष्मी की कृपा से, गर्ग मुनि आदेश
नाग सुता से विवाह का, मन में है आवेश -49 ख
-दोहा-
नाग लोक में आने का, यही कारण तुम जान
यही है मेरी कामना, यही है लक्ष्य महान -49 ग
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
कहे महीधर सुनो कुमार, हम शिव भक्त नाग परिवार
तुम विष्णु को सर्वस मानो, द्वेष ईर्ष्या कपट को जानो
कैसे हो संबंध तुम्हारा, हमको नहीं लगता है गंवारा
सुनकर महीधरजी की वाणी, कहने लगे अग्रसेन मानी
बड़े बड़े वेद शास्त्र बखाने, शिव हृदय विष्णु को माने
इनमें नहीं भेद कोई धारो, जो धारे वह भव नहीं पारो
हम हैं सूर्यवंश के जाए, सत्य प्रतिज्ञा सदा सुहाए
छल कपट ईर्ष्या बेइमानी, हमने नहीं कभी है जानी
सुनकर अग्रसेन की कथनी, हुए प्रसन्न महीधर हरषी
इतने में उद्दालक मुनि आये, सब नागों ने शीश नवाये
उद्दालक मुनि कहने लागे, हे नागेश्वर भाग है जागे
अग्रसेन है योद्धा भारी, सत्यकर्म वचन के धारी
यह विवाह दोनों कुल माहिं, होगा परम पुण्य फलदायी
सुनकर महामुनि की वाणी, हुए प्रसन्न सभी हरषानी
नागलोक में खुशियां छाई, सबके मन प्रसन्नता आयी
-दोहा-
राजा महीधर खुश हुए, रानी हर्ष अपार
नाग लोक के अंदर, सब कर रहे जयकार -50
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
हुए प्रसन्न नाग नर नारी, देख अग्रसेन माधवी प्यारी
राजा महीधर मन में ठानी, होगा विवाह सजे रजधानी
निपुण विश्वकर्मा वहां आये, सुन्दर रजधानी को सजाये
तोरण द्वार पताका नाना, भांति भांति क्या करें बखाना
सुन्दर महल सजाये सारे, देखि देखि सब मन हर्षाये
माधवी की सखियां सारी, मन में अमित मोद है धारी
विवाह की कर रहीं तैयारी, सुन्दर सुवदनी सब नारी
एक महल को बहुत सजाया, अग्रसेनजी को वहां ठहराया
नाग युवक सेवा में लागे, अति उछाह सब के मन जागे
माधवी की सखी सयानी, हंस हंसकर करे मन मानी
माधवी को सजाने लागि, मेहंदी हाथ रचावण लागि
गणपति को मनावण लागि, सुन्दर गीत वे गावण लागि
गीत
हल्दी को रंग सुरंग निपजै मालवे जी
कंचन बरणि केसरी जी आवै बहुत सुगंध
निपजै मालवै जी..
या हल्दी विनायकजी मुलाई बाई रिद्धि सिद्धि रै मन कोड
निपजै मालवै जी...
या हल्दी विष्णुजी मुलाई महालक्ष्मी रै मन कोड
निपजै मालवै जी...
या हल्दी रामचंद्रजी मुलाई बाई सीता रै मन कोड
निपजै मालवै जी...
या हल्दी सब देवन मुलाई सब देवियां रै मन कोड
निपजै मालवै जी...
या हल्दी अग्रसेनजी मुलाई रानी माधवी रै मन कोड
निपजै मालवै जी...
-दोहा-
तेल बान की रस्म हुई, सब के मन में मोद
अग्रसेनजी को बुलाकर, भर दी उनकी गोद -51
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
नागलोक के नर और नारी, सज रहे हैं सब होत सुखारी
पुरवासी मन आनंद छाया, उत्सव देख सभी हर्षाया
एक सुन्दर घोड़ी मंगवाई, भांति-भांति गहनों से सजाई
अग्रसेन उस पर बैठाये, सुन्दर कन्या नृत्य दिखाए
सूत बंदी मागध गुण गायक, चले सभी हैं जो जेहि लायक
घोड़ी चढ़कर दूल्हा आया, देखि सभी के मन वह भाया
स्वागत कर रही नाग नर नारी, नागेन्द्री ने आरती उतारी
अग्रसेन घोड़ी चढ़ आये, सखियां मिलकर तोरण गाये
तोरण गीत
तोरण आयो रायबर थर थर काप्यां राज
पूछो माधवी बनी नै, कामणगारा कुण छै राज
म्हे काईं जाणा म्हारा जोसी कामणगारा राज
जोसीजी रो नेग चुकास्यां, कामण ढीला छोड़ो राज
म्हे काईं जाणा महारा नाई कामणगारा राज
नायां रो नेग चुकास्यां कामण ढीला छोड़ो राज
म्हे काईं जाणा बनी री सखियां कामणगारी राज
सखियां रो नेग चुकास्यां कामण ढीला छोड़ो राज
(गीत कामण)
बन्नो काकड़ आय बिराज्यो जी रस कामणिया
बन्नो तोरण आय बिराज्यो जी रस कामणिया
बन्नो फेरा आय बिराज्यो जी रस कामणिया
बन्नो थापा आय बिराज्यो जी रस कामणिया
बन्नो महला आय बिराज्यो जी रस कामणिया
-दोहा-
घोड़ी पर बैठे हुए, तोरण दियो है मार
माधवी की मातुश्री, आरती रही उतार -52 क
-दोहा-
सखियां हंस हंस कर रही, भांति भांति मनुहार
अग्रसेनजी की देख छंटा, सभी हो रही निहाल -52 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
घोड़ी से उतरे महिपाला, सकल सुमंगल भये तत्काला
तभी माधवी सखियों संग आयी, दूल्हे को वरमाला पहनायी
आशीर्वाद मुनियों ने दीन्हा, मंत्रोच्चार महीदेवन कीन्हा
गर्ग मुनि तभी वहां आये, आग्रेय के मंत्री जी लाये
उद्दालक मुनि ब्रह्म कुमारा, देख देख हर्षित है अपारा
मंगलाचार करहिं सब कोई, नाग लोग हरषहिं सुन सोई
नाग बने माण्डेति नाना, करने लगे बहुत सन्माना
नाना विधि के पेय पिलाये, अमृत सम सब लेकर आये
हुई खुशी चहुंओर घनेरी, दूल्हे को देखे सब कोई
हंसी मजाक कर रहे हैं नाना, सबको मिला मान सम्माना
-दोहा-
खातिरदारी खूब करि, महीधर राज महान
बार बार देखहूं नयन, अग्रसेन धर ध्यान -53
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
वरमाला की रस्म निभाई, सुन्दर सखी सभी इठलाई
माधवी ने कुंवर को देखा, सुन्दर मूरत उर में लेखा
हुई रस्म अनेक प्रकारी, फेरों की हो रही तैयारी
पंडित थे वेदों के ज्ञानी, सप्तपदी की करि बखानी
सखियां मिल गणपति मनाये, फेरों के मिल गीत हैं गाये
(गीत)
पहलो फेरो लियो बाई माधवी तो दादाजी नै बहुत ही प्यारी ओ राज
रुपिया बहुत लुटाया ओ राम
दूजो फेरो लियो बाई माधवी तो बापूजी न बहुत ही प्यारी ओ राज
मणियां बहुत लुटाई हो राम
तीजो फेरो लियो बाई माधवी तो मायड़ न बहुत ही प्यारी ओ राज
सोना खूब लुटाया हो राम
चौथो फेरो लियो बाई माधवी तो माधवी हुई पराई ओ राज
अन्न धन खूब लुटाया हो राम
-दोहा-
सप्त पदी की रस्म हुई, देवी देव मनाय
थापा धोक लगाय के, माता गले लगाय -54 क
-दोहा-
प्रिय लागहिं जोड़ी घणी, सकल सुमंगलाचार
राजा महीधर नागेन्द्री, देखो हृदय में धार -54 ख
-दोहा-
देवी देव पूजकर, करके मंगलाचार
नागलोक की नारी बोली, बनड़ा श्लोक सुनाए -54 ग
-दोहा-
सुनकर सुन्दर बैन, अग्रसेन हंसने लगे
कमल से जिनके नैन, श्लोक सुनावहिं हंसी कर -54 घ
श्लोक
बल्लभसेन जी प्रतापपुर का महीधरजी महामानि
अग्रसेन घोड़ी चढ़ आये, माधवी हरषानी
श्लोक
सुसरोजी नागों के राजा, सासूजी महाराणी
बेटी जायी घणी सोवणी सकल भुवन की राणी
श्लोक
अग्रसेनजी श्लोक सुणाया सासुजी ने लुभाया
लक्ष्मीजी की कृपा दृष्टि से प्रभुशरण हर्षाया
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
महीधर जी मन में हर्षाई, सभी बाराती लिए बुलाई
सज्जन गोठ की हुई तैयारी, नाना विधि के पकवान थे भारी
बनी अनेक विचित्र मिठाई, रबड़ी सरस नमकीन सुहाई
खीर जलेबी परोसन लागे, लाडू भुजिया पेठा लावे
दही रायता और कलाकंद, लगे परोसन सब मनभावन
माधवी की मां और दादी, बुआ बहन संगी और साथी
देवन लगी सिठना नाना, हंसी हंसी कर सब करहिं बखाना
सीठना
मैदा को सीरो करूं पूड़ी करूं पचास
पांचू बांधूं आंगली, छठो बांधूं गास
मूरख हो तो जीमियो नहीं खोलो म्हारो गास
बल्लभसेन का घर सूं आया, महीधरजी के पास
सगा जिमायी सात मिठाई छूट्या म्हारा गास
सीठना
बृहतसेन तो म्हारो सागी ए मावसो कदेई न नूत जिमायी
ओ मावसा
मेरै तो मन में इसी इसी आवै एं मावसै न पकड़ पछाडूं
ओ मावसा
बल्लभसेन तो म्हारो सागी ए मावसो कदेई न नूत जिमायी
ओ मावसा
मेरै तो मन में इसी इसी आवै एं मावसै न पकड़ पछाडूं
ओ मावसा
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल सुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
नागराज महीधर हर्षाये, जोड़ी देख अमित सुख पाए
दायजो दियो अनेक प्रकार, स्वर्ण रजत मणिमय है हार
वस्त्र रेशमी दरी गलीचे, हाथी घोड़े सभी मन खींचे
फिर भी मन संतुष्टी नाहीं, मन में सोचे क्या दूं जंवाई
नागलोक के तल थे नाना, अतल वितल सुतल विधि नाना
एक तल बनड़े को दीन्हा, अग्रतल नाम कर लीन्हा
अगरतला आज कहलाता, सुंदर सुखद सभी मन भाता
शैव वैष्णव संस्कृति मिलाई, बहुविधि आशीष दिया जंवाई
विदा घड़ी ज्यों ज्यों नियराई, नागेन्द्री मन भर भर आई
माधवी को गले लगाया, गोद बिठायै छाती चिपटाया
कहने लगी माधवी माई, सदा पति की बनो सहाई
सब जन की तुम सेवा करना, नारी धर्म का यही कहना
दौड़ दौड़कर सखियां आई, बिलख बिलख कर गले लगाई
-दोहा-
नागराज महीधर ने, चौकी लेई मंगाय
बैठा अग्रसेन माधवी, तिलक दिन्ह लगाय -55 क
-दोहा-
अग्रसेन और माधवी, गर्ग मुनि महाराज
ले बाराती चल पड़े शोभा हुई अपार -55 ख
-दोहा-
सात रात्रि विश्राम कर, नगरी अपने आए
देख आग्रेय नगरी की शोभा, सबके मन हरषाए -55 ग
-दोहा-
पुण्यकाल सो जानकर, नगर में किया प्रवेश
हुए प्रसन्न देख माता को, अनुज भाई समेत -55 घ
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
देख मातु अनुज हरषाए, ब्राहाण उनको ढूंढ ले आए
प्रतापपुर के पूर्व पुरोहित, वे भी साथ वहां थे आए
माधवी सहित प्रणाम है कीन्हा, बहुविधि आशीर्वाद है लिन्हा
अश्रु छलक छलक कर आए, पर ये बूंदे खुशी है लाए
मंगलगान करहिं नर नारी, मां भगवती ने आरती उतारी
मंगल भवन अमंगल हारी, महालक्ष्मी पूजे नर नारी
ब्राह्मण वेद पाठ नित करहिं, वणिक सदा चारव्रत धरहिं
क्षत्रिय रक्षा भार उठाए, सेवाधर्म सभी मन भाए
पुण्य प्रदेश बना वह भारी, देख देव मन ईर्ष्या भारी
गौ ब्राह्मण की सेवा करहिं, जीवन सफल मान हर्षहिं
-दोहा-
अग्रसेनजी के राज्य में नहीं अतिवृष्टि अकाल
वृक्ष सदा पल्लवित रहे, गौवंश हुआ निहाल -56 क
-सोरठा-
सुंदर चरित अपार, पावन परम पवित्र यह
करें मनुज कल्याण, जो नर सुनहिं व गावहिं -56 ख
-सोरठा-
जैमिनी मुख बतलाय, अग्रसेन पावन चरित
महालक्ष्मी हरषाय कर, सदा आंगने बरसहिं -56 ग
बोलिये महालक्ष्मी मैया की जय, अग्रसेन जी महाराज की जय
-चतुर्थ स्कंध सम्पूर्ण-