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तृतीय स्कंध
श्लोक
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।
भावार्थ—हे अर्जुन जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब तब मैं प्रकट होकर धर्म की स्थापना करता हूं।
-दोहा-
महालक्ष्मी को शीश नवाकर, धर विष्णु का ध्यान
महायशस्वी अग्रसेन का, चरित करूं गुणगान -20
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
अग्रसेन सकल गुणराशि, सुन्दर बदन मधुर थे भाषी
राजकाज में हाथ बंटाते, जनता के सब कष्ट मिटाते
राजा की आंखों के तारे, प्रजा के थे वे रखवारे
आगे का अब हाल सुनाऊं, श्री कृष्ण को मन में ध्याऊं
कौरव पांडव दोनों भाई, कौरव में थी स्वार्थ अधिकाई
स्थिति बहुत विकट थी भारी, युद्ध की हो गई तैयारी
महाभारत का ताना बाना, बड़े बड़े शास्त्रों में बखाना
-दोहा-
एक दिवस की बात है, जुटा था राज समाज
जन मंगल पर कर रहे, चर्चा श्री अग्रसेन महाराज -21
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कोर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
चर्चा में सब लगे थे भारी, सत्य कर्म पर करे विचारी
द्वारपाल निकट था आया, उसने आकर के बतलाया
पांडव दूत एक है आया, मिलने की मन चाहत लाया
तुरंत दूत अंदर बुलवाया, उसने आकर यह फरमाया
हे महीपति हे महाराज, में हूं दूत पांडव कुल राज
उनका मैं संदेशा लाया, युद्ध में आने को कहलाया
दुर्योधन की मति है मारी, दुखी हो रही पृथ्वी सारी
आकर धर्म युद्ध में भाई, सत्य की आप करो सहाई
पांडव दूत की सुनी सब बातां, बल्लभसेन कहे सुखदाता
पांडव वंश है मित्र हमारा, हम आएंगे वचन हमारा
सुनकर बल्लभसेन की वाणी, हुआ प्रसन्न दूत सुखमानी
-सोरठा-
करके दूत विदाय, राजा यों कहने लगे
धर्म युद्ध के माय, लड़ने को आतुर सभी -22 क
-सोरठा-
क्षत्रिय धर्म विचार सेना सब सजने लगी
रणभेरी को बजाय हो मतवाले चल दिए -22 ख
(तर्ज - राधेश्याम रामायण)
बल्लभसेन और अग्रसेन ने सेना को यह समझाया है।
युद्ध में चाहे प्राण जाए पर पैर न पीछे आया है।
यह धर्म युद्ध नृसिंहों का पूर्वजों का मान बढ़ाना है।
सूर्यवंश की ख्याति को फिर सूर्य की ज्यों चमकाना है।
हम सब मिल कर इस युद्ध में धर्म ध्वजा फहराएंगे।
पापियों का कर संघार, कुरुक्षेत्र से आएंगे।
-दोहा-
आरूढ़ होकर दिव्य रथ, राजा राजकुमार
युद्ध क्षेत्र में आ गए, है लड़ने को तैयार -23
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
युद्ध भूमि की महिमा भारी, दो शिविरों में थी तैयारी
एक तरफ थे कौरव सारे, दुर्योधन के वे सब प्यारे
पांडव एक तरफ थे न्यारे, श्री कृष्ण उनके थे सहारे
युद्ध नगाड़े बजने लागे, रथी सारथी सजने लागे
कुरुक्षेत्र की महिमा भारी, रण की भेरी लग रही प्यारी
अग्रसेन निज संग सहाई, पिता सहित पांडव दल माई
आय पांडव दल मिले सभी से, परिचय हुआ युधिष्ठिरजी से
श्रीकृष्ण मिल भए सुखारे, आशीर्वाद लिया मिल सारे
-दोहा-
युद्ध की हो रही घोषणा, शंख ध्वनि महि छाय
रणभेरी सुन सुन कर, सभी योद्धा हरषाय -24
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
धृष्टधुम्न सेना संभारी, एक से एक बलि थे भारी
नाना वाहन नाना योद्धा, विकट भट्ट लगते थे जोद्धा
पैदल रथ हाथी सारथी, लड़ने को तैयार महारथी
अर्जुन भीम नकुल सहदेवा, लड़ने को उद्यत प्रणलेवा
चलेउ भंयकर कटकु अपारा, चतुरंगिनीसेना बहुधारा
विविध भांति वाहन रथ नाना, विपुल बरन पताक निशाना
चले मत्त हाथी घनेरे, युद्ध भूमि के दे रहे फेरे
-दोहा-
इसी बीच घटना घटी, चकित हुए भूपाल
अर्जुन हुए विषादग्रस्त, गांडिव नीचे डाल-25 क
-सोरठा-
गीता ज्ञान बतायकर, श्रीकृष्ण कहने लगे
कर्म है सबसे महान, उठ अर्जुन तू युद्धकर -25 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
गीता ज्ञान अर्जुन को दीन्हा, उर के तम को प्रभु हर लिन्हा
अर्जुन गांडिव धनुष उठाई, लड़ने को तैयार थे भाई
होने लगे शगुन शुभ नाना, शंख ध्वनि भेदहिं सब काना
-छंद-
भेदहिं शंख ध्वनि कर्ण में वीरन भुजा फड़कावहिं
मदमस्त हाथी गर्जहिं चहुं दिशी पिशाचिनी नाचहिं
मारहिं काटहिं धांवहिं पुनि पुनि रिपु पछाड़हिं
बिन सारथी के रथ फिरहिं कहीं सारथी पद नापहिं
चंवर पताका छत्र चामर, इधर उधर बिखरी पड़ी
बिन मुण्ड के धड़ चल रहे, कहि मुण्ड उछलत नाचहिं
-दोहा-
एहि विधि युद्ध के माय, रहे खेत योद्धा कई
सायंकाल उठाय, अग्नि समर्पित करहिं सब -26 क
-दोहा-
भीष्मपिता के क्रोध से धरती हो गई लाल
वल्लभसेन घायल हुए, पहुंचे सुरगा माय -26 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
पितृमरण की सुनकर काना, व्याकुल अग्रसेन दुःख माना
क्रोधित होकर बाण चलाये, रिपु सेना के कष्ट बढ़ाए
रथ सारथी तुरग गज नाना, मारें सभी भंयकर बाणा
देख युद्ध कौरव घबराये, देख देख पाण्डव हर्षाये
दिवस अठारह बीते एहि भांति, मारे गए दुष्ट सब घाती
पितृशोक से व्याकुल भारी, अग्रसेन हो रहे दुखारी
-दोहा-
अग्रसेन को देख दुःखी, श्रीकृष्ण समुझाय
जनम मरण है देह का, आत्मा अमर कहलाय -27 क
-दोहा-
श्रीकृष्ण के वचन सुन, हरषा राज समाज
अग्रसेन ने तर्पण कर, बंदऊ विप्र समाज -27 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
पांडव विजय हुए सब भाई, श्रीकृष्ण की शरण में आई
जो जो युद्ध मरे भट्ट नाना, दाह कर्म किन्हा विधि नाना
युद्ध में साथ देने जो आये, वे सब आदर मान थे पाये
अग्रसेन रुख वदन निहारी, राजा युधिष्ठिर बोले बिचारी
राजकुमार तुम अमित हो मानी भुजबल में नहीं कोई सानी
विविध भांति सम्मान कराया, निज हाथों से हार पहनाया
विदा कीन्ह बाहर तक आए, अग्रसेन यह देख सुहाए
श्री कृष्ण अभिवादन कीन्हा, शीश नवाय वंदना कीन्हा
श्रीकृष्ण मुख हर्ष उछाही, अग्रसेन उर लिया लगायी
दीन्ही आशीष विविध विधि नाना, अग्रसेन सुन भये सुखाना
अपने राज्य चले हरषायी, पिता अभाव अवश्य दुःखदायी
प्रतापपुर पहुंचे नर साईं, पिता मरण की बात बतायी
सुनकर समाचार दुखदायी, सारी नगरी अति दुःख पायी
-दोहा-
मातु गोद में बिलखकर, किया पिता गुणगान
धीरज धर कर रानी बोली, सुनो मेरे पुत्र महान -28 क
-दोहा-
होनी तो होकर रहे, अनहोनी ना होये
तात विधाता की करनी, बदल सके न कोई -28 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
राजपुरोहित तुरंत वहां आये, सबको धीरज बहुत बंधाये
ज्ञान देय तम को हर लीन्हा, जाआगे के कारज को चिन्हा
राजसमाज भगवती रानी, दीन्ह श्रद्धांजलि बहु दुःख मानी
ब्राह्मण मंत्री राज परिवार, आगे पर कर रहे विचार
राजपुरोहित कहने लागे, मंत्री और सभासद सागे
अग्रसेन सब विधि है लायक, कुल भूषन जन प्रिय नायक
ये सबके हैं चहेते घनेरे, हर जन को लगते हैं मेरे
-दोहा-
बल्लभसेन के अनुज थे, कुंदन सेन सुजान
पर कुंदन का पुत्र था, सठ खल अनीति निधान -29 क
-दोहा-
कुंदन सेन के पुत्र का, बज्रसेन था नाम
सुनकर आग-बबुल हो गया, महा दुष्ट बदनाम -29 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
अग्रसेन बनेंगे राजा, सुन बज्रसेन गया भागा भागा
पिता एकांत निकट बैठाया, उस पापी ने यह समझाया
राजपुरोहित सभी समाज, है विरुद्ध आपके आज
आप बड़े हो इस दरबार, अग्रसेन क्यों बने सरदार
सुन पुत्र की भेद की वाणी, कुंदन सेन ने सत्य बिसारी
उसके मन में पाप था छाया, पिता पुत्र मिल खेल रचाया
अपने निजी अनुचर बुलाये, बता योजना तुरंत पठाये
आधी रात समय जब आया, अनुचर सहित वहां वह आया
अग्रसेन सो रहे थे स्वामी, सत्य मार्ग के वे अनुगामी
उनके मन में पाप नहीं था, लालच लोभ मद काम नहीं था
चारों ओर घेरा है डाला, अग्रसेन बंदी कर डाला
कुंदन सेन मर्यादा भूला, सूर्यवंश का नाम भी भूला
ऐसा अधम निपट अज्ञानी, कुल द्रोही यह जनता मानी
-दोहा-
अग्रसेन विचार कर, बोले बचन महान
आप बड़े हैं तात हमारे, शासक बनो महान -30 क
-दोहा-
मुझे राज्य की भूख नहीं, ना चाहिए सम्मान
प्रजा सुखी रहे हमारी, यही है जतन महान -30 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
सुनकर अग्रसेन की वाणी, और कुपित हुआ अज्ञानी
पैरो से प्रहार है कीन्हा, बोला वचन क्रोध भर लीन्हा
यदि जीवित रहना तू चाहता, बन जा दास मान मुझे दाता
अग्रसेन सुनकर यह वाणी, क्रोधित हो धाये भयदानी
कुंदनसेन को तुरत ललकारा, सिर उसकी छाती में मारा
करने लगा बकवाद कुटीचर, हो बेहाल गिरा धरनी पर
-लहर-
कुंदन सेन की दशा देख, बज्रसेन चकराया है
निज अनुचरों को तुरत बुलाकर अग्रसेन पकड़ाया है
भयभीत हुआ वह मन ही मन, घबराहट उसमें आयी है
हथकड़ी बेड़ी मंगवाकर, अग्रसेन को लगायी है
काराग्रह में डाल के उसने, मुनादी यह करवाई है
अग्रसेन है शत्रु हमारा, करे न कोई सहाई है
अग्रसेन की देख दशा, सभी प्रजा दुःख पायी है
सत्य मार्ग पर जो चलता है, सदा कष्ट वह पायी है
-दोहा-
सद्पुरुषों में ग्लानी भई, जनता हुई उदास
ईश्वर से विनती करे, हो बज्रसेन विनाष -31
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
अहंकार कुंदन उर आया, बज्रसेन को तुरंत बुलाया
कहने लगा वह खल कामी, सुनो पुत्र मेरी मनमानी
जैसे भी हो करो सब काज, हो अभिषेक मेरा तो आज
डरा डरा कर लाओ सबको, जनता में मेरा भय भर दो
-दोहा-
राजसिंहासन बैठकर, करने लगा वह घात
मदिरा का सेवन करे, खूब करे उत्पात -32
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
सारी प्रजा दुखी थी भारी, कुंदन सेन ने सुरती बिसारी
नाच गान में रमा था रहता, मदिरा का वह सेवन करता
धर्म हीन हो गए सभासद, जनता की नहीं लेते सुध बुध
जो दरबारी सत्यव्रती थे, वे सारे के सारे दुखी थे
अग्रसेन उनको प्रिय भारी, करे सहायता यही विचारी
एक मंत्री था बड़ा पुराना, था वह बूढ़ा बड़ा सयाना
एक दिन वह जेल में आया, अग्रसेन को यह बतलाया
पुत्रधर्म की बात विचारो, संकट से तुम प्रजा उबारो
पहले प्राण बचावो अपने, पूरे करो प्रजा के सपने
अग्रसेन को बहुत समझाया, सुरंग मार्ग उसको दिखलाया
बाहर सुरंग मार्ग से आये, दीन हीन मन में सकुचाये
-दोहा-
खबर मिली बज्रसेन को, अग्रसेन गए भाग
क्रोधित होकर दौड़ पड़ा वह, सैनिक लीन्हे साथ -33 क
-दोहा-
अग्रसेन महाराज भी, जानत थे सब बात
तीव्रगति से बढ़ चले, आश्रम एक सुहात -33 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
अग्रसेन दुखी थे भारी, चाचा के लालच को बिचारी
मन में अनेक विचार कर रहे, जीवन तजने की बात कर रहे
आश्रम देख कुछ धीरज आया, मन में प्रसन्नता भी लाया
इतने में वहां गर्ग मुनि आये, अग्रसेन को निकट बुलाये
देख अवस्था मन में विचारी, है यह राजकुमार दुखी भारी
दया मुनि को उन पर आयी, निकट पहुंचे मुनि सुखदायी
कौन हो वत्स कहां से आये, सुनकर अग्रसेन बतलाये
-दोहा-
महाराज युवराज मैं, अग्रसेन मेरा नाम
प्रतापपुर राजधानी है, विकट दशा में जान -34 क
-सोरठा-
सुनकर मीठे बैन, गर्ग मुनि कहने लगे
सकल जगत अधार, महामाया भगवान की -34 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
गर्ग मुनि ने निकट बुलाया, अपने पास बैठा सहलाया
ऋषि ने ज्ञान दिया है भारी, सुनकर अग्र भये सुखारी
मां अम्बे का चरित सुनाया, कैसे करें प्रसन्न बताया
आश्रम में एक कुटी बनायी, अग्रसेन को दी सम्भलायी
महालक्ष्मी का चरित सुनाया, मेधा ऋषि का ज्ञान बताया
सुनकर सुरथ राजा की कहानी, ऋषिवर ने जो कीन्हि बखानी
अग्रसेन मन हर्ष उछाही, करूं प्रसन्न मैं लक्ष्मी मायी
बार बार मुनि शीश नवाया, आशीर्वाद ऋषि से पाया
-दोहा-
मन में कर संकल्प शुभ, धर लक्ष्मी का ध्यान
माता की मूरत गढी, बहुत मान सम्मान -35 क
-दोहा-
पूजन कर श्रृंगार कर, खीर का भोग लगाय
महालक्ष्मी हिय धारकर, मां में लोय लगाय -35 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
अग्रसेन मन हर्ष उछाही, शीघ्र प्रसन्न करूं महामार
नाम विविध विधि जापन लागे, उर के दोष दूर सब भागे
करने लगे महालक्ष्मी सेवा, सिद्धि का अमिट फल लेवा
करने लगे जब मां का ध्यान, पाया मां से अमिट सम्मान
मां की स्तुति गाने लागे, मां को भजन सुनाने लागे
भजन
जगत मोहिनी महालक्ष्मी जी, सुन लो विनय हमारी जी
रोम रोम में बसी है माता, सुन्दर छवि तुम्हारी जी
रोम रोम में बसी....
अटल सिहांसन बैठी माता, सिर पर मणि मय छत्र धरे
खीर चूरमो खील बतासा, भक्त तुम्हारी भेंट करे
आस और विश्वास लिए मां, पूजा करें तुम्हारी जी
रोम रोम में बसी....
बड़े बड़े असुरों को मारा, भूमि भार उतारा है
बड़े बड़े दुष्टों को माता, तुमने यहीं पछाड़ा है
भक्तों को तूने तार दिया मां, कर गज की सवारी जी
रोम रोम में बसी...
मां दुःखों का मारा हूं मैं, हरदम चिंता भारी
जीवन नैया डगमग डोले, एक है आश तुम्हारी
मात बचा ले मुझको आके, रखना लाज हमारी जी
रोम रोम में बसी....
जो भी किंकर दर पे आया, जननी गले लगाया है
मुझसे क्या अपराध हुआ जो, तूने दूर भगाया है
सब अपराध माफ कर मैया, शरण तुम्हारी आया जी
रोम रोम में बसी....
मैं हूं अधम नहीं कुछ जानूं, पर तेरो मैं ध्यान धर्यो
आकर मुझे बचा ले माता, चरणों में मैं तेरे पांड्यो
प्रभू शरण में दास तिहारों, कृपा आपकी चाहूं जी
रोम रोम में बसी...
-दोहा-
हे जगदम्बा प्रसन्न हो, महालक्ष्मी मेरी मात
दीनों की रक्षा करो, परम दयालु आप -36 क
-दोहा-
मैं दीनन में दीन हूं, परम कृपा मयी आप
तीन लोक में कौन है दानी, माता जैसी आप -36 ख
-दोहा-
हरी प्रिया प्रसन्न हो, ऐसी लागी आस
ग्यारह सौ दिन बीत गए, मुख छाया स्व प्रकाश -36 ग
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
किया कठिन तप प्रगटी माता, पद्मासन पर बैठी माता
शंख चक्र गदा पद्म थे धारे, दिव्य प्रकाश से भये उजियारे
अनंत ज्योति दस दिशा में छायी, रात्रि अमावस भई सुखदायी
सहस्त्रों दीपक जग मग लागे, अंधकार तम दूर थे भागे
गंधर्व मिलकर गान कर रहे, सब देवन मिल मान कर रहे
हर्षित हो रही धरती सारी, मंद सुगंध तब बही बयारी
माता का मुख हर्षित भारी, देख अग्रसेन हुए सुखारी
हो प्रसन्न माता यूं बोली, सुन्दर बदन नयन थे खोली
किन्ही तुमने तपस्या भारी, मैंने वर देने की विचारी
अग्रसेन सुन मां की वाणी, बह रहे अश्रु जुड़े थे पाणी
-दोहा-
अग्रसेन कहने लगे, कल्पवृक्ष हैं आप
वरदानी वर दीजिए, अमिट भक्ति के साथ -37 क
-दोहा-
जीव मात्र में दया रहे, हर पल तुम्हारा ध्यान
काम क्रोध मद दूर हों, सदा सत्य की आन -37 ख
-सोरठा-
सुनकर सुंदर बैन, मां प्रसन्न कहने लगी
सभी अभिलाषा पूर्ण हों, सत्य वचन मेरा मान लो -37 ग
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
महालक्ष्मी की कृपा थी भारी, अग्रसेन हो गए सुखारी
मन प्रसन्न तन तेज बिराजा, मन में नव उत्साह भी जागा
आय अग्र गुरु चरण नवाया, मां प्रसन्न हुई हाल सुनाया
मुनिवर गर्ग प्रसन्न हुए भारी, समय देख बोले शुभकारी
बिन पुरुषार्थ सफलता नाहीं, बीज बोय फल लागे भायी
कर्म कर्या हीं देव सहाई, जिससे मिले वांछित फल चाही
अग्रसेन बोले सकुचाई, कैसे करूं मुनिवर पुरुषाई
बिन धन बल कोई काज न होई, नहीं सहायक दिखता कोई
पिता समरागण हुए वीरगति, चाचा की मारी गई मति
अब क्या कर्तव्य सुनाओ स्वामी, आप हैं जग में अंतर्यामी
-सोरठा-
अग्रसेन की बात सुन, गर्ग मुनि कहने लगे
वत्स करो सुविचार, सब कारज सधजायसी -38 क
-दोहा-
महालक्ष्मी प्रसन्न है, महिमा उनकी महान
मैं भी करूं सहायता, राज्य बनेगा महान-38 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
गर्ग मुनि बतावण लागे, पूर्व इतिहास सुनावण लागे
मरुत्त राजा की कथा सुनाई, यज्ञ हवन की बात बताई
गर्ग ऋषि ने यह बतलाया, मरु प्रदेश का धन दिखलाया
राज्यलक्ष्मी आ गई घनेरी, राज्य स्थापना की मनहेरी
वेदांती ब्राह्मण बुलवाये, गर्ग मुनि आचार्य बनाये
किया अभिषेक बनी रजधानी, विद्वानों की कि सन्मानी
ब्राह्मणों के चरण पखारे, पद सरोज राजा उरधारे
रमापुरी निर्माण करायी, पुण्यभूमि थी श्रेष्ठ कहायी
आग्रेय हुआ पुरी का नाम, सुंदर सुखद लक्ष्मी का धाम
गर्ग ऋषि को कुलगुरु बनाया, उच्चासन पर उन्हें बैठाया
होने लगे सभी शुभकाम, आग्रेय नगरी मंगलधाम
कूप बावड़ी पोखर बनवाये, वन उपवन उद्यान लगाए
सुन्दर राजमहल सजवाया, विश्वकर्माओं को बुलवाया
अस्त्र शस्त्र शस्त्रागार, चहुं दिशि ऊंची थी दीवार
देश देश से बहुजन आये, बालक पशु सभी ले आये
चार वर्ण के नर और नारी, आग्रेय नगर की शोभा भारी
सबको उचित स्थान है दीन्हा, बसने का सम्मान है दीन्हा
महालक्ष्मी कुल देवी बनायी, श्रीपीठ की स्थापना करायी
कनक आभूषण सुन्दर साजे, देख देख प्रजा मन नाचे
-दोहा-
अग्रसेन महाराज की, शोभा हुई महान
देवों में जो इंद्र है, वैसे लगे सुखधाम -39 क
-दोहा-
महीदेवों का महाराज ने, खूब किया सम्मान
सदा पांव है पूजते, धर लक्ष्मी का ध्यान -39 ख
-दोहा-
अग्रसेन की नगरी की, शोभा अमित अपार
हो प्रसन्न महालक्ष्मी ने, सभी भरे भण्डार -39 ग
-सोरठा-
सुन्दर चरित अपार, कहहिं सुनही नर नारी जो
मंगलमय कल्याण, महालक्ष्मी की कृपा रहे -39 घ
बोलिये महालक्ष्मी मैया की जय, अग्रसेन महाराज की जय
-तृतीय स्कंध सम्पूर्ण-