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पंचम स्कंध
श्लोक
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमंसुखं
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि
भावार्थ
हे मां जगदम्बे मुझे सौभाग्य एवं आरोग्य प्रदान करो परम सुख आत्म स्वरुप का ज्ञान एवं मोह पर विजय तथा यश प्रदान करो
-दोहा-
यह सब चरित कहां, मैं हरजन के कल्याण
जो सत्य व्रत को धारण करता, होता वही महान -57
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
अग्रसेन पराक्रमी भारी, सभी वर्णों की करे रखवारी
सबको सदा सुलभ थे राजा, हरजन के करते सब काजा
हरजन को राजा प्रिय लागे, जनता प्राण प्रिय सब माने
थी प्रसन्न पृथ्वी महतारी, होता अन्न प्रचूर प्रकारी
गौवंश था अति सुखियारा, दूध दही की बहती धारा
-दोहा-
काम क्रोध मद लोभ से, दूर थे नर नारी
अहंकार व्यापे नहीं, अग्रसेन की द्वारी -58
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
ईश्वर की थी कृपा भारी, धर्म नेम में लगे नर नारी
अचानक एक संकट आया, सबके मन में भय था लाया
एक बरस बीता एहिं भांति, बादल ने नहीं की बरसाती
यद्यपि अन्न की कमी नहीं थी, पानी की भी कमी नहीं थी
राजा थे पुरुषार्थी भारी, प्रजा रक्षा की कि तैयारी
नाले कूप अनेक खुदाये, जगह जगह तालाब बनाये
नदियों का जल लेकर आये, जल प्राप्ति के अनेक उपाए
नदी नहर जलधार बह रही, प्यासी धरती उछाह कर रही
नहीं प्रजा को कष्ट था आया, देवराज यह सुन गुस्साया
-दोहा-
मानुष के इस कर्म से, अपमानित स्व जान
देवराज कहने लगे, आग्रेय करूं सुनसान -59 क
-दोहा-
अग्नि को आज्ञा देयी, जला करो सब खाक
अग्रसेन के बल को, चूर करो सब आज -59 ख
-दोहा-
लहलाती फसलें जली, दुखी हुए नरनारी
कुलगुरु गर्ग विचार के, बोले शब्द उचारी -59 ग
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
गर्ग कहे सुनो ऐ राजा, नहीं साधारण है यह काजा
अग्नि ने जो आग लगाई, उसमें इंद्र की है सठताई
देवराज मन ईर्ष्या भारी, तुमने ब्याही नाग कुमारी
इंद्र स्वयं ब्याहना चाहते, अपमानित अपने को पाते
यह सब है उनकी ही करणी, ग्लानि भाव समन्वित बरणी
अग्रसेन ऋषि गर्ग से बोले, सत्यवचन पुरुषार्थ खोले
हम देवों के सदा सहाई, यज्ञ कर्म से करें सेवकाई
फिर भी यदि इंद्र मन माहिं, काम क्रोध मद लोभ है आयी
तो मैं युद्ध करूं रण माहिं, आशीर्वाद आपका पाहि
देवत्व है जब तक सुर माहीं, तब तक ताकत है उन माहीं
जबहि देव सत्य को त्यागा, भयऊं विभव बिनु दुखी अभागा
अग्रसेन विचार उर आवा, महालक्ष्मी की शरण को पावा
-दोहा-
श्रीपीठ महालक्ष्मी का, उत्तम बना था धाम
अग्रसेन वहां पहुंचकर, कर रहे मां का ध्यान -60
श्लोक
श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद
श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मै नमः
हिरण्यवरणा हरिणीं सुवर्ण रजस्त्रजाम
चंद्रां हिरण्यमयी लक्ष्मी जातवेदो मआवह
पद्मानने पदमऊरु पद्माक्षी पद्मसंभवे
तन्मे भजषि पद्माक्षी येन सौंख्यं लभाम्यहम्
पद्मानने पद्मिनी पद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्म दलायताक्षी
विश्वप्रिये विश्वमनोनुकुले त्वतपाद पद्ममयि सनिधत्सव्
-दोहा-
हाथ जोड़कर करि प्रार्थना, मां को किया प्रसन्न
अग्रसेन से कही मात ने, सुनो पुत्र मेरे वचन-61 क
-दोहा-
देवराज ने किन्ही अनीति, करूं क्षीण सब अंग
स्तंभित कर दूंगी मैं, नहीं रहेगा दंभ -61 ख
-दोहा-
भय मुक्त है कर दिया, छोड़ा भय का भान
रणभेरी बजाय के, आ गए चतुर सुजान -61 ग
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
अग्रसेन रथ चढ़कर आये, देवी देव चरण सिर नाये
इंद्रराज गर्जहिं तेहि काला, तीव्र बाण चलाय भुवाला
अग्रसेन ने काटे बाण, क्रोधित हुए देव अभिमान
यह संग्राम हुआ था भारी, गिरे थे उल्कापिण्ड भयकारी
देव पितर पृथ्वी नर नारी, व्याकुल थे हो रहे दुखारी
इतने में देवगुरु आये, युद्ध के मध्य खड़े फरमाए
इंद्र अग्र दोनों बली मानी, उतरे रथ से की सन्मानी
बृहस्पति गुरु ने समझाए, लोक हित की बात बताए
सुनकर देवगुरु की वाणी, कहने लगे शचिपति सुरमानी
देवगुरु नहीं बैर हमारा, अग्र परीक्षा ध्येय विचारा
-दोहा-
अग्रसेन नर श्रेष्ठ हैं लीन्हि परीक्षा आय
मित्र हमारे रहे सदा, करेंगे सदा सहाय -62 क
-दोहा-
इंद्र वचन प्रिय लागहि, धर कर मन में धीर
अग्रसेन कहने लगे, हे सुर श्रेष्ठ प्रवीण -62 ख
-दोहा-
आज धन्य मैं हो गया, सुनकर सुंदर बैन
देवराज और देवगुरु, करो सदा सुख चैन -62 ग
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
अग्रसेन सुरगुरु सिर नावा, सुरपति को भी शीश नवावा
स्वागत किया बहुत ही भांति, उनकी बात बहुत सुहाती
बोले देवराज मधुवाणी, मित्र बनो तुम सुर समनामी
तीन लोक में नाम तुम्हारा, सत्य नेम व्रत पालनहारा
-दोहा-
दे वरदान देव मुनि, हो गए अंतर्ध्यान
अग्रसेन निज कर्म से भू पर बने महान -63
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
अग्रसेन सकल गुण राशि, प्रजा वत्स ज्ञानी मृदुभाषी
गृहस्थ धर्म बहु विधि संभाला, एक नारी व्रत को है पाला
उनकी रानी बड़ी सयानी, माधवी थी सभी गुणखानी
ईश्वर की संतति बढ़ाना, धर्म कार्य सभी ने माना
अग्रसेन और माधवी रानी, किए पुत्र पैदा सब मानी
एक वर्ष का अंतराल था, पुत्रों का कुनबा विशाल था
अठारह पुत्र नृप गृह आयी, सत्य धर्म सबने अपनायी
सबके नाम अमित प्रभावी, सेन सभी के अंत में आयी
-छंद-
विभू विक्रम अजय विजय अनल नीरज सोहहिं
अमर नगेंद्र सुरेश श्रीमंत सोम धरणीधर सही
अतुल अशोक सुदर्शन, सिद्धार्थ से महामना
गणेश्वर लोकपति, सभी पुत्र थे शुभ घणा
एक कन्या पैदा हुई, ईश्वरी शुभ नाम से
इन सब की संतति बढ़ी, अग्र वंश के नाम से
-दोहा-
हुए अठारह पुत्र सब, एक से बढ़कर एक
नागकुल में ब्याह कर एक से हुए अनेक -64 क
-दोहा-
कन्या ईश्वरी सर्वगुणी, काशीराज के महेश
विवाह किया अति हर्ष से, सुमिरी गौरी गणेश - 64 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
सभी पुत्र पुत्री गए ब्याहे, सब जन के वे अति मनभाये
नेम धर्म के पालनहारे, पुत्र पुत्रवधु सभी पियारे
कुछ वर्षों चला एहि भांति, सत्कर्मों की बढ़ रही ख्याति
वंश वृद्धि हुई है भारी, पुत्र पौत्र सभी सुखारी
एक दिवस गर्ग मुनि आये, आदर दे राजा बैठाये
गर्ग मुनि बोले सुनो राजा, इक्ष्वाकु रघुवंश है ख्याता
इनने अपना वंश बनाया, सूर्य वंश में नाम कमाया
वंश कर यज्ञ किया था भारी, तभी बने कुल के अधिकारी
वंशकर नामक यज्ञ महान, जो करता पाता सम्मान
अभिलाषाएं पूर्ण हो सारी, प्रजा अनुकूल सदा सुखारी
-दोहा-
हाथ जोड़ गुरु शीश नवां, बोले अग्र महान
करो तैयारी यज्ञ की, जैसा वेद विधान -65 क
-दोहा-
जेष्ठ पुत्र विभुसेन को, दिया दायित्व सम्मान
सब तैयारी कर रहे मंत्री, श्रेष्ठी सुजान - 65 ख
-दोहा-
दूर दूर से ऋषिगण आये, कर रहे मंगलाचार
वेदव्यास ब्रह्मा बने, आनंद छाया अपार - 65 ग
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
यज्ञ संरचना अजब बनाई, गर्गमुनि कर रहें अगुवाई
कश्यप अत्रि श्रंगी ऋषि आये, ऋत्वज बनकर यज्ञ कराए
अग्रसेन माधवी महारानी, हाथ जोड़कर की सन्मानी
जो जो ऋषिवर आदेश देहि, राजा रानी करे सोई सोई
सत्रह दिवस यज्ञ एहि भांति, पूर्ण किए यज्ञ विधि भांति
अग्रसेन मन भयी उदासी, देख रुधिर मांस बलि भांसी
ग्लानि से मन अति दुःख पावा, विचलित हो महलों में आवा
-दोहा-
यज्ञ में पशुवध देखकर, दुखी हुए महाराज
मुख कांति फीकी पड़ी, हृदय फट रहा आज -66 क
-दोहा-
मन में दृढ़ निश्चय किया, हिंसा नहीं सुहाए
चाहे जो करना पड़े, पैर न पीछे आय -66 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
राजा ने यह मन में ठानी, प्राणी पर नहीं हो मनमानी
सब में एक ईश्वर का बासा, अग्रसेन ने ज्ञान प्रकासा
ऋषिगणों ने शास्त्र बताया, बलि विधान का नियम दिखाया
क्षत्रिय धर्म बताया सबने, बलि विधान समझाया सबने
क्षत्रिय धर्म पर करो विचारा, यज्ञ पूर्ण करो सपरिवारा
पर राजा के समझ न आयी, प्राणी हिंसा पाप बतायी
सत्य अहिंसा प्रण है मेरा, इसमें नहीं करूं मैं फेरा
चाहे जो परिणाम हो इसका, है स्वीकार करूं नहीं हिंसा
-दोहा-
हाथ उठाकर प्रण लिया, हिंसा नहीं स्वीकार
क्षत्रिय धर्म को त्यागकर, वैश्य है अंगीकार -67 क
-दोहा-
अपने निज स्वार्थ हित, बना है बलि विधान
बिना बैर के निरीह पशु की, बलि नहीं स्वीकार - 67 ख
-दोहा-
समुद्र सीमा लांघ ले, हिमालय करे हिम त्याग
चंद्र भले प्रभा तजे, अटल अग्र की बात -67 ग
-दोहा-
वैश्य धर्म अनु पालना, है मुझको स्वीकार
दया धर्म रक्षा करूं, हर प्राणी से प्यार - 67 घ
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
वैश्य धर्म अंगीकार है किन्हा, सत्य धर्म का व्रत है लीन्हा
कहे अग्रसेन मुनि बुलाकर, यज्ञ पूर्ण करो अब आकर
दूध दही से बलि बनायी, यज्ञ पूर्ण किया मुनि आयी
सत्रह यज्ञ क्षात्र वरणायी, अठारहवां हुआ वैश्य विधायी
यज्ञ उपरान्त प्रिय जन प्रबोधा, अहिंसा ज्ञान दिया सुबोधा
सब जन को राजा ने बुलाया, अहिंसा परमो धर्म बताया
सभी प्रजा मन में हरषाई, अग्रसेन जयकार लगाई
-दोहा-
प्रजा की रक्षा सत्य का पालन, शुभ आचार व्यवहार
कृषि विपणन उद्योग का, खूब हुआ प्रचार - 68 क
-दोहा-
गौ ब्राह्मण विद्वान का, खूब हुआ सन्मान
अग्रसेन के राज में, सत्य को अभयदान - 68 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
बहुत समय बीता एहि भांति, सत्य धर्म की बढ़ रही ख्याति
अग्रसेन की देख खुशाली, पापी राजा हुए बेहाली
सबने मिल योजना बनाई, आग्रेय पर हम करें चढ़ाई
कई राजा मिल लड़ने आये, धन के लोभी मिल कर धाये
चारों ओर घेरा है डाला, शत्रु का हो रहा बोलबाला
अग्रसेन को मिली सूचना, अनुज, पुत्र से की मंत्रणा
सेनापति हुंकार लगाए, विभुसेन ने शंख बजाए
चला अमित योद्धा महामानि, शत्रु सेना की कि निगरानी
अस्त्र शस्त्र से मारन लागा, शत्रु दल का हृदय था कांपा
विभुसेन बोला ललकारी, बाहुबल अजेय है धारी
वैश्य धर्म इसलिए अपनाया, प्राणी मात्र पर करने दाया
-दोहा-
विभुसेन ने क्रोध कर, मारे तान कर बाण
भस्म हुई शत्रु सेना, हार गये शैतान -69 क
-दोहा-
बंदी सब कर ले चले, हाथ हथकड़ी डाल
ला पटका महाराज सामने, सारा दुष्ट समाज - 69 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
आतातायी बने बिचारे, मूर्छित थे सारे के सारे
लालच ने अंधा था बनाया, सबने उसका ही फल पाया
अग्रसेन दरबार में आये, बंदी बने राजा सिर नाये
महाराजा को दया थी आई, विभुसेन से बोले साईं
दासत्व से इन्हें मुक्त कराओ, घर जाने की राह दिखाओ
सुनकर अग्रसेन की वाणी, आतातायी हो गए पानी
अग्रसेन की जयकार लगाई, क्षमा पाय अपने घर जाई
-दोहा-
अजातशत्रु थे बन गए, अग्रसेन महाराज
द्वेष किसी से था नहीं, करते सबसे प्यार -70 क
-दोहा-
श्रद्धा थी उनमें बड़ी, नहीं जरा अभिमान
दानी मानी जन्म से, वेद शास्त्र का ज्ञान -70 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
यज्ञ किया देवों को रिझाया, पितरों को संतुष्ट बनाया
दीन दुखी की सेवा करके, सारी प्रजा को सुखी बनाया
समय बीता बड़ी अवस्था आयी, मन में वन जाने की आयी
करे तपस्या दिन और रात, मन में है बस एक ही बात
महर्षि गर्ग को है बुलवाया, आदर मान दे बैठाया
कही सभी मन की अभिलाषा, सुनकर ऋषि प्रसन्न थे खासा
कहे गर्ग मुनि सुनो हे राजन, आप हैं सत्यव्रती कुल पालक
है सौभाग्य आपका भारी, ज्येष्ठ पुत्र विभुसेन सुविचारी
प्रजा समाज सभी मन प्यारा, श्रेष्ठीजन मंत्री का दुलारा
है समर्थ सब विधि है लायक, शूरवीर जनप्रिय है नायक
-दोहा-
गुरु की आज्ञा पाय कर, किया तिलक शुभ मान
राजा बन गए विभुसेन, बहुत मान-सम्मान -71 क
-दोहा-
दिया ज्ञान निज पुत्र को, सात वचन बतलाय
सत्य धैर्य पवित्रता, इससे लक्ष्मी आय -71 ख
-दोहा-
अग्रसेन सब पुत्र को अपने निकट बुलाय
दे मिलजुल रहने की शिक्षा, आप चले वन माय - 71 ग
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
सारी जनता दुखी थी भारी, प्रेम डोर से बंधी थी सारी
नेत्रों में आंसू भर भारे, विदा करत रोये सब सारे
वन में आय तपोधन लिन्हा, अर्थ काम सबको तज दीन्हा
कठिन नियम व्रत अपनाया, महालक्ष्मी का ध्यान लगाया
त्रिभुवन की अधिश्वर रानी, भुवनेश्वरी महालक्ष्मी जानी
अग्रसेन माधवी रानी, मिलकर करे मातु गुणगानि
भजन
सारे जगो को छोड़ के मैया शरण तुम्हारी आया हूं
हे महालक्ष्मी कृपा करो मां दर्शन करने आया हूं
हे महालक्ष्मी कृपा...
सब जग की रखवाली मैया सबकी पालनहार है
है त्रिगुणी शक्ति मेरी मैया जीवन का आधार है
सारी दुनिया छोड़ के माता शरण तुम्हारी आया हूं
हे महालक्ष्मी कृपा...
ममतामयी मां तेरा आसरा, जगजननी कल्याणी है
तू ही है त्रिभुवन की स्वामिनी, तू ही खेवनहारी है
छोड़ के सारे रिश्ते नाते, शरण तुम्हारी आया हूं
हे महालक्ष्मी कृपा...
ना चाहिए धन दौलत माता सब झूठा संसार है
चरणों की भक्ति मुझे दे दे यही मेरा आधार है
सभी अवलंब छोड़कर मैया प्रभू शरण में आया हूं
हे महालक्ष्मी कृपा...
श्लोक
सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवल तरांशुक गंध माल्यशोभे
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवन भूति करि प्रसीद मह्यम
-दोहा-
शरणागत रक्षक महालक्ष्मी, विनती करो स्वीकार
दर्शन दो मातु अंबिके, मैं तो आ गया तेरे द्वार -72 क
-दोहा-
एक पैर पर खड़ी तपस्या कर रहे राजा-रानी
महालक्ष्मीजी प्रकट हो गई, सकल भुवन महारानी -72 ख
-दोहा-
अग्रसेन और माधवी, मां को रहे निहार
चरणों में वे गिर गए, प्रणवऊं बारंबार - 72 ग
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
मां को बारंबार सिर नावा, चरणों में महाआनंद पावा
हंसकर मां ने उन्हें उठाया, मां का मुख मंडल हर्षाया
कहने लगी मातु कल्याणी, वर मांगों जो इच्छा मानी
अग्रसेन मां से यूं बोले, दर्शन से हो गए वरेले
केवल भक्ति का दान दीजिए, सब जन का कल्याण कीजिए
सुनकर अग्रसेन की इच्छा, मां ने दी वर भक्ति भिक्षा
साथ ही मां ने यह वर दीन्हा, वंश बढ़े सत्य धर्म प्रवीणा
हो विख्यात सकल जग माही, सत्य धर्म को जो अपनायी
मुझमें अमिट भक्ति जिन माईं, सकल कामना पूरहूं ताईं
जो नित मेरा पूजन करहिं, वही अग्रवंशी स्व कहहिं
जो श्रीपीठ में दर्शन करहिं सकल पदार्थ मुझसे लहहिं
सूर्य चंद्रमा है जब ताहिं, मेरी कृपा अमिट प्रभावी
-दोहा-
ऐसा कह वरदायिनी हो गई अन्तर्ध्यान
अग्रसेन उर आनंद छाया, मन में मां का ध्यान -73
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
इतने में विमान एक आया, देवदूत उसको था लाया
देवदूत ने यह बतलाया, शुभकर्मों का फल यह पाया
स्वर्ग चलन की शुभघड़ी आयी, आप और महारानी ताहीं
कहने लगे तभी महाराजा, देवदूत से मन की बातां
कर्मफल का भोग स्वर्ग है, नहीं प्राणी वहां अमर है
होवे खत्म कर्मफल जबहिं, मानुष तन पावे पुनि तबहिं
आवागमन चक्र नहीं छूटा, गर्भघोर अंधकार में लौटा
मेरी इच्छा स्वर्ग की नाहिं, अक्षयधाम बसा मन माहिं
-दोहा-
देवदूत को विदा किया, बहुत मान सम्मान
ज्ञानयोग में तत्पर हो करने लगे निज ध्यान - 74 क
-दोहा-
ध्यान परम वैराग्य बल, उत्तम बोध महान
शाश्वत मोक्ष को प्राप्त हुए राजा रानी सुजान -74 ख
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
आग्रेय नगरी बनी थी पावन, हरजन के मन को थी भावन
विभुसेन राजा व्रतधारी, प्रजा की करते थे रखवारी
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य थे नाना, अहिंसा परमोधर्म था माना
एकनारी व्रत धीर गंभीर, महालक्ष्मी के भक्त प्रवीण
अग्रसेनजी की शिक्षाधारी, हो रहे धन्य सभी नरनारी
नगर मध्य महालक्ष्मी धाम, श्रीपीठ सब करे सम्मान
कुलदेवी महालक्ष्मी बिराजे, सकल कामना पूरण काजे
-दोहा-
अग्र का संदेश यह, सत्य धर्म शुभ आस
बुरा किसी का मत करो, करो ईश्वर विश्वास -75
-चौपाई-
जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सकल भुवन में कीर्ति थारी
महालक्ष्मी की कृपादृष्टि से, मानवता के बने पुजारी
अग्रसेन का चरित्र यह पावन, है भवभेषज अमित सुहावन
प्रतिदिन पाठ करे नर कोई, महालक्ष्मी की कृपा अति होई
प्रति माह मंगल जो गावे, सुख-समृद्धि उर आनंद आवे
जन्मोत्सव अवसर जब आई, घर में मंगल पाठ कराई
शादी ब्याह का अवसर होई, मंगलपाठ करे सब कोई
रिद्धि सिद्धि उनके घर आवे, महालक्ष्मी कभी नहीं जावे
अग्रसेन के वंशज सारे, मंगलपाठ सदा उर धारे
महालक्ष्मी में श्रद्धा लाई, विधिवत् घर में पाठ कराई
सभी क्लेश घर से भग जावे, सुख धन-धान्य सदा वे पावे
महालक्ष्मी को भोग लगावे, अग्रसेन को मन में ध्यावे
सदा दिवाली उनके रहती, मातेश्वरी की कृपा बरसती
-छंद-
श्रीअग्र का मंगल चरित नित गान जो नर गावहिं
कमलवासिनी लक्ष्मी मां वाकें संकट टारहिं
धन संपदा आरोग्य ले संसार में ले सुख घणा
संसार सागर पार कर वह सर्वदा सुख पावहिं
-दोहा-
महालक्ष्मी करुणामयी, श्रीअग्रसेनजी आय
धन दौलत बरसा करो, करियो सदा सहाय - 76 क
-सोरठा-
सत्य धर्म स्वीकार, क्षमा दया व्रत धार के
जो कोई करे प्रणाम, भव सागर तर जायसी -76 ख
-सोरठा-
मंगलगान महान, महालक्ष्मी की कृपा है यह
सुनहिं जे नर धर ध्यान, सदा दिवाली रहहिं घर - 76 ग
बोलिये महालक्ष्मी मैया की जय, अग्रसेनजी महाराज की जय
-पंचम स्कंध सम्पूर्ण-