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वचन का बंधन और एक पिता का टूटता हुआ हृदय

(12)

वचन का बंधन और एक पिता का टूटता हुआ हृदय

अयोध्या का राजमहल उस रात शांत था, पर भीतर एक ऐसा तूफ़ान उठ चुका था, जो पूरे राजवंश की दिशा बदलने वाला था।

जब रानी कैकेयी ने अपने कठोर और अटल वचन सुनाए, तो महाराज दशरथ जैसे स्तब्ध रह गए। उनके लिए यह केवल एक माँग नहीं थी—यह उनके जीवन का सबसे बड़ा आघात था। एक क्षण के लिए वे समझ ही नहीं पाए कि यह सब सच है या कोई भयानक स्वप्न। उनके मन में अजीब-अजीब विचार उठने लगे—क्या यह भ्रम है? क्या उनका चित्त विक्षिप्त हो गया है? या कोई अदृश्य शक्ति उनके विवेक को हर रही है?

उनकी आँखें शून्य में टिक गईं, और वे गहरे दुःख में डूबते चले गए। ऐसा लगा मानो उनकी आत्मा पर किसी ने भारी पत्थर रख दिया हो। धीरे-धीरे यह आघात इतना असहनीय हो गया कि वे मूर्छित होकर गिर पड़े।

कुछ समय बाद जब उन्हें होश आया, तो कैकेयी के शब्द फिर उनके कानों में गूंजने लगे—और इस बार वे पहले से भी अधिक पीड़ादायक थे। उनका हृदय जैसे चीर दिया गया हो। वे कैकेयी की ओर देखते, और उन्हें वही स्त्री अब भयावह लगने लगी, जैसे कोई मृग अचानक बाघिन को देख ले—डर, पीड़ा और असहायता से भरा हुआ।

राजा अब भूमि पर बैठे थे, बिना किसी सहारे के। उनकी साँसें भारी हो गई थीं, और वे गहरी-गहरी सांसें ले रहे थे, जैसे कोई विषैले सर्प को किसी मंत्र से बाँध दिया गया हो और वह तड़प रहा हो।

अचानक उनके भीतर क्रोध और पीड़ा का ज्वार उमड़ पड़ा। “धिक्कार है!”—यह कहते हुए वे फिर मूर्छित हो गए। उनके भीतर की चेतना जैसे बुझती जा रही थी।

जब फिर से उन्होंने आँखें खोलीं, तो उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार उनमें पीड़ा के साथ-साथ आक्रोश भी था। उन्होंने कैकेयी को देखा—पर वह अब उनकी प्रिय रानी नहीं थी, बल्कि एक निर्दयी स्त्री प्रतीत हो रही थी।

कंपित स्वर में, क्रोध और दुःख से भरे हुए, उन्होंने कहा—
“हे निर्दयी कैकेयी! तूने यह क्या कर डाला? तू इस कुल का विनाश करने पर क्यों तुली है? मैंने या मेरे राम ने तेरा क्या बिगाड़ा है?”

उनके शब्दों में केवल आरोप नहीं था, बल्कि एक टूटे हुए हृदय की चीख थी।

वे आगे बोले—
“राम तो तुझे अपनी सगी माँ के समान मानते हैं। उन्होंने सदा तेरी सेवा की, तुझे सम्मान दिया। फिर तू उनके साथ इतना अन्याय कैसे कर सकती है?”

दशरथ को अब अपने ही निर्णय पर पछतावा होने लगा। वे सोचने लगे कि उन्होंने कैकेयी को अपने जीवन में स्थान देकर कितना बड़ा भूल किया। उनकी वाणी कड़वी हो गई—
“शायद मैंने अपने विनाश के लिए ही तुझे इस घर में लाया था। तू तो विष से भरी नागिन निकली!”

उनका हृदय राम के प्रेम से भरा हुआ था। वे बोले—
“जब पूरा संसार राम के गुणों की प्रशंसा करता है, तो मैं कैसे उन्हें त्याग दूँ? मैं अपनी रानियों को छोड़ सकता हूँ, अपना राज्य भी त्याग सकता हूँ, पर अपने राम को नहीं!”

अब उनकी आवाज़ भर्रा गई थी—
“राम को देखते ही मेरा हृदय प्रेम से भर जाता है। और जब वे सामने नहीं होते, तो ऐसा लगता है जैसे मेरी चेतना ही समाप्त हो रही हो…”

उनके शब्दों में अतिशयोक्ति नहीं थी—वह एक पिता का सच्चा भाव था।

“सूर्य के बिना यह संसार शायद चल सकता है, पानी के बिना खेती भी हो सकती है… लेकिन राम के बिना मैं जीवित नहीं रह सकता!”

अब वे पूरी तरह टूट चुके थे। उनका अभिमान, उनका राजसी स्वरूप—सब कुछ समाप्त हो चुका था। वे केवल एक असहाय पिता थे।

विनती करते हुए वे बोले—
“ऐसा वर माँगने से कोई लाभ नहीं है, कैकेयी। कृपा करके इस हठ को छोड़ दे। देख, मैं तेरे चरणों में अपना सिर रखता हूँ… मुझ पर दया कर!”

यह दृश्य अत्यंत मार्मिक था—एक महान सम्राट, जो कभी किसी के सामने नहीं झुका, आज अपनी ही पत्नी के सामने गिड़गिड़ा रहा था।

कुछ क्षणों के लिए वे रुके, फिर जैसे किसी समझौते के लिए तैयार होते हुए बोले—
“यदि तुझे भरत का राज्य चाहिए, तो मैं वह भी दे दूँगा। मैं भरत का राज्याभिषेक स्वीकार करता हूँ… लेकिन राम को वन भेजने की बात मत कर।”

उनकी आवाज़ में अब आशा की एक हल्की किरण थी—शायद कैकेयी पिघल जाए।

फिर उन्होंने याद दिलाया—
“तू ही तो कहती थी कि राम तेरे सबसे बड़े पुत्र हैं, धर्म में श्रेष्ठ हैं। क्या वह सब केवल दिखावा था? क्या तूने यह सब केवल अपनी सेवा कराने के लिए कहा था?”

अब उन्हें संदेह होने लगा कि कैकेयी का प्रेम कभी सच्चा था ही नहीं।

वे बोले—
“आज राम के अभिषेक की बात सुनकर तू दुखी हो गई है, और मुझे भी दुख दे रही है। ऐसा लगता है जैसे इस घर में कोई अशुभ शक्ति तुझ पर छा गई है…”

दशरथ को यह सब अन्याय प्रतीत हो रहा था—
“इक्ष्वाकु वंश में ऐसा अन्याय कभी नहीं हुआ! तेरी बुद्धि कैसे इतनी विकृत हो गई?”

फिर भी, उनके भीतर कहीं एक विश्वास बाकी था—
“आज तक तूने कभी ऐसा अनुचित कार्य नहीं किया। इसलिए मुझे विश्वास ही नहीं होता कि तू यह सब कह रही है…”

वे उसे समझाने की कोशिश करते रहे—
“तेरे लिए तो राम और भरत दोनों समान हैं। तूने स्वयं कई बार यह बात कही है…”

फिर वे करुण स्वर में बोले—
“हे भयभीत स्वभाव वाली देवी! तू उन राम को, जो धर्मात्मा हैं, जिन्हें सब प्रेम करते हैं, चौदह वर्ष के लिए वन भेजना कैसे उचित समझती है?”

उनकी आँखों के सामने राम का कोमल रूप घूम रहा था—
“वे सुकुमार हैं, धर्म में अडिग हैं… उन्हें वनवास देना तुझे कैसे अच्छा लग रहा है? तेरा हृदय इतना कठोर कैसे हो गया?”

अब वे लगभग रो पड़े—
“जो सदा तेरी सेवा में लगे रहते हैं, जो तुझे प्रसन्न रखने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं—उन्हीं राम को तू देश निकाला देना चाहती है?”

उन्होंने अंतिम प्रयास किया—
“मैंने तो हमेशा देखा है कि राम ही तेरी सबसे अधिक सेवा करते हैं। भरत भी उतना नहीं करते जितना राम करते हैं…”

 

अयोध्या का राजमहल उस समय किसी श्मशान-सी निस्तब्धता में डूबा हुआ था। महाराज दशरथ का हृदय जैसे भीतर से टूट चुका था। वे बार-बार कैकेयी को समझाने का प्रयास कर रहे थे—उनकी वाणी में करुणा भी थी, तर्क भी, और एक असहाय पिता की गिड़गिड़ाहट भी।

वे भारी स्वर में बोले—
“कैकेयी! क्या तुम्हें नहीं दिखता कि राम इस संसार में सबसे श्रेष्ठ हैं? वे केवल मेरे पुत्र नहीं, बल्कि आदर्श पुरुष हैं। गुरुजनों की सेवा में, वचन पालन में, धर्म के आचरण में—उनका कोई सानी नहीं। उन्होंने कभी किसी को कष्ट नहीं दिया, कभी कटु वचन नहीं कहा। ऐसी निर्मल आत्मा में तुम्हें दोष कैसे दिखाई दे रहा है?”

दशरथ की आँखों में आँसू भर आये। वे अपने ही शब्दों में डूबते जा रहे थे।
“मेरे राजमहल में हजारों लोग हैं—रानियाँ, सेवक, सैनिक… पर किसी के मुख से राम के विरुद्ध एक भी शिकायत मैंने नहीं सुनी। वह सबके प्रिय हैं, सबके हृदय पर उनका अधिकार है। वे अपने मधुर व्यवहार से पूरी प्रजा को अपने वश में रखते हैं।”

उनका स्वर काँपने लगा, जैसे हर शब्द के साथ उनका हृदय भी टूट रहा हो—
“राम केवल शस्त्रों से ही नहीं, अपने गुणों से भी सबको जीत लेते हैं। सत्य, दान, तप, त्याग, मित्रता—हर सद्गुण उनमें जीवित है। वे तो देवताओं के समान हैं, फिर तुम उनका अनिष्ट क्यों चाहती हो?”

अब दशरथ की वाणी में विनती का स्वर और गहरा हो गया—
“कैकेयी, मैं वृद्ध हो चुका हूँ… मृत्यु के द्वार पर खड़ा हूँ। तुमसे दया की भीख माँग रहा हूँ। जो चाहो मैं तुम्हें दे दूँगा—धन, राज्य, ऐश्वर्य—पर राम को मत छीनो मुझसे… मेरे प्राणों को मत हर लो।”

वे सचमुच उसके चरणों में झुकने लगे—राजा नहीं, एक असहाय पिता बनकर।

लेकिन कैकेयी… उसका हृदय जैसे पत्थर बन चुका था।

उसने कठोर स्वर में उत्तर दिया—
“राजन! यदि आपने मुझे दो वरदान दिये थे और अब उनसे पीछे हटते हैं, तो आपका धर्म कहाँ जाएगा? आप संसार में क्या मुँह दिखाएँगे?”

उसकी वाणी में न करुणा थी, न संकोच—केवल अडिग हठ।

“जब लोग आपसे पूछेंगे कि आपने अपने वचन का क्या किया, तब क्या उत्तर देंगे? क्या यह कहेंगे कि आपने अपनी प्राणरक्षिका कैकेयी से किया हुआ वचन तोड़ दिया?”

दशरथ के हृदय पर यह वज्राघात था।

कैकेयी आगे बोली—
“इतिहास गवाह है—राजा शैब्य ने अपने वचन के लिए अपना मांस तक काट दिया, राजा अलर्क ने अपने नेत्र दान कर दिए। और आप… एक साधारण-से वचन को निभाने में पीछे हट रहे हैं?”

वह रुकी नहीं—
“अब चाहे यह धर्म हो या अधर्म, सत्य हो या असत्य—आपने जो वचन दिया है, उसमें परिवर्तन नहीं हो सकता। यदि राम का राज्याभिषेक हुआ, तो मैं यहीं आपके सामने विष पीकर प्राण त्याग दूँगी।”

यह सुनते ही दशरथ जैसे भीतर से काँप उठे।

कैकेयी ने और भी कठोर शब्द कहे—
“मैं यह भी नहीं सह सकती कि कौसल्या ‘राजमाता’ बनकर सबका सम्मान पाए और मैं हाथ जोड़ती रहूँ। मेरे लिए तो मर जाना ही बेहतर है।”

अब उसने अंतिम वार किया—
“मैं शपथ लेकर कहती हूँ—मुझे केवल एक ही वर चाहिए—राम का वनवास और भरत का राज्याभिषेक। इसके अतिरिक्त मुझे कुछ भी स्वीकार नहीं।”

इतना कहकर वह शांत हो गई—पर वह शांति तूफान से भी अधिक भयावह थी।

 

महाराज दशरथ अब पूर्णतः टूट चुके थे। वे रोते रहे, विनती करते रहे, पर कैकेयी के हृदय में कोई हलचल नहीं हुई। उसकी चुप्पी ही उसकी जिद का प्रमाण बन चुकी थी।

जब उन्होंने उसके मुख से यह अमंगलकारी वाक्य सुना—“राम का वनवास और भरत का राज्याभिषेक”—तो उनकी इन्द्रियाँ जैसे शून्य हो गईं। वे स्तब्ध होकर उसे देखते रह गए, मानो विश्वास ही न हो रहा हो कि यह वही कैकेयी है जिससे वे प्रेम करते थे।

उनकी आँखों में अविश्वास, पीड़ा और भय—तीनों एक साथ उमड़ पड़े।

कैकेयी की कठोर वाणी उनके हृदय को ऐसे भेद रही थी, जैसे वज्र प्रहार हो। उनकी सारी शांति, सारी स्थिरता छिन चुकी थी।

अचानक उनके मुख से एक हृदयविदारक पुकार निकली—
“हा राम!”

और उसी क्षण वे एक कटे हुए वृक्ष की तरह भूमि पर गिर पड़े।

उनकी चेतना डगमगाने लगी। शरीर निश्चेष्ट हो गया। वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे कोई महान तेजस्वी सर्प मंत्रों के प्रभाव से निष्प्राण हो गया हो।

राजमहल की दीवारें भी जैसे उस करुण दृश्य को देखकर रो उठी हों…

किसी तरह उन्होंने स्वयं को संभाला, और अत्यन्त दीन, टूटी हुई आवाज़ में कैकेयी से बोले—

“अरी कैकेयी… तुझे क्या हो गया है? तुझे अनर्थ ही अर्थ क्यों लग रहा है? किसने तुझे यह भयानक सलाह दी? क्या किसी दुष्ट ने तेरे मन में यह ज़हर घोला है?”

उनकी आँखों में अविश्वास था—मानो वे सामने खड़ी स्त्री को पहचान ही नहीं पा रहे हों।

“मुझे तो लगता है जैसे तेरा मन किसी अज्ञात शक्ति के वश में हो गया है… जैसे तू अपने आप में नहीं रही। तू जो कुछ कह रही है, वह तेरे स्वभाव के बिल्कुल विपरीत है। क्या तू वही कैकेयी है, जिसे मैं जानता था?”

दशरथ का स्वर अब पीड़ा से काँप रहा था। वे अतीत की ओर लौटते हुए बोले—

“जब तू बालिका थी, तब तेरी सरलता, तेरी मधुरता, तेरी करुणा—सब कुछ कितना पवित्र था। पर आज… आज मैं तुझे पहचान नहीं पा रहा हूँ। तुझे किस बात का भय सता रहा है कि तू ऐसा भयानक वर माँग रही है—भरत को राजसिंहासन और राम को वनवास!”

उन्होंने दोनों हाथ जोड़ लिये, जैसे किसी अपराधी की तरह विनती कर रहे हों—

“यह विचार अधर्म है, अन्याय है… अभी भी समय है, अपने इस निर्णय से पीछे हट जा।”

लेकिन उनके शब्दों में अब करुणा के साथ क्रोध भी घुलने लगा था—

“हे क्रूर स्वभाव वाली! यदि तू अपने पति का, अपने पुत्र भरत का, और इस समस्त संसार का भला चाहती है, तो इस पापपूर्ण संकल्प को त्याग दे।”

दशरथ के मन में एक और पीड़ा उठी—

“तू किस बात से दुःखी है? क्या मैंने या राम ने तेरा कोई अहित किया है? राम के बिना तो भरत भी यह राज्य स्वीकार नहीं करेंगे… वे तो धर्म में राम से भी आगे हैं!”

यह कहते-कहते उनकी आँखों के सामने एक दृश्य उभर आया—राम का।

“सोच, जब मैं राम से कहूँगा—‘वन को चले जाओ’—तो उनके मुख की आभा कैसी म्लान हो जाएगी… जैसे राहु के ग्रास में आया चन्द्रमा। मैं उस दृश्य को कैसे सह पाऊँगा?”

उनकी आवाज़ भर्रा गई।

“मैंने राम के अभिषेक का निर्णय कितने विचार-विमर्श के बाद लिया था… सबकी सहमति से… और अब मैं उसे कैसे बदल दूँ? लोग क्या कहेंगे? वे मेरा उपहास करेंगे… मुझे मूर्ख कहेंगे…”

अब दशरथ केवल एक राजा नहीं थे—वे एक भयभीत, टूटे हुए पिता थे।

“जब लोग मुझसे पूछेंगे—‘राम कहाँ हैं?’—तो मैं क्या उत्तर दूँगा? क्या यह कहूँगा कि मैंने अपनी ही पत्नी के कहने पर अपने पुत्र को वन भेज दिया?”

उनकी आँखों से आँसू झरने लगे।

“और यदि मैं कहूँ कि मैंने सत्य निभाया—तो वह पहले का वचन असत्य हो जाएगा… और यदि राम चले गए, तो कौशल्या… वह क्या कहेगी? उसका हृदय टूट जाएगा…”

अब वे पछतावे में डूब गए—

“कौशल्या… जो हर रूप में मेरा साथ देती रही—पत्नी, सखी, बहन, माँ… मैंने तेरे कारण उसका कभी उचित सम्मान नहीं किया। आज वही बात मुझे भीतर से जला रही है… जैसे रोगी को अपथ्य भोजन कष्ट देता है…”

उनका मन आगे बढ़ा—

“सुमित्रा… वह भी यह सब देखकर भयभीत हो जाएगी। और सीता… बेचारी सीता… उसे एक साथ दो वज्रपात सहने होंगे—राम का वनवास और मेरी मृत्यु!”

दशरथ की साँसें भारी हो गईं।

“जब वह राम के लिए रोएगी, उसका शोक देखकर मेरे प्राण भी नहीं टिक पाएँगे… वह हिमालय की किन्नरी की तरह हो जाएगी—अपने प्रिय से बिछुड़ी हुई, अकेली…”

अब उनकी आवाज़ में मृत्यु की आहट थी—

“मैं यह सब देखकर जीवित नहीं रह सकता… तू राज्य कर लेना… विधवा होकर…”

फिर अचानक उनके स्वर में कटुता आ गई—

“मैंने तुझे सती समझा था… पर तू तो विष निकली! जैसे मीठी मदिरा में छिपा हुआ ज़हर… तूने मीठे शब्दों से मुझे बाँधा, और आज मेरे प्राण ले रही है।”

उनकी आँखों में अपमान और वेदना एक साथ जल रहे थे—

“लोग मुझे धिक्कारेंगे… कहेंगे—‘यह वही राजा है जिसने एक स्त्री के मोह में पड़कर अपने पुत्र को वन भेज दिया।’”

वे भीतर से टूट चुके थे—

अयोध्या का वह रात का समय… महल के भीतर सब कुछ शांत था, पर उस शांति के भीतर एक भयंकर तूफ़ान उठ चुका था। महाराज दशरथ का हृदय टूट चुका था, और अब वे शब्दों में अपना वह असहनीय दुःख बहा रहे थे—ऐसा दुःख, जो किसी पिता के लिए सबसे बड़ा होता है।

 

राजा की आँखों में आँसू थे, स्वर काँप रहा था, और वे कैकेयी को देखते हुए जैसे अपने ही भाग्य को कोस रहे थे।

 

वे भारी साँस लेकर बोले—

“हाय… यह कैसा दुःख है! यह कैसी पीड़ा है, जिसे मैं सहने के लिए विवश हूँ? लगता है जैसे यह सब मेरे ही पूर्व जन्म के पापों का फल है, जो आज मेरे सामने इतना बड़ा संकट बनकर खड़ा हो गया है…”

 

उनके शब्दों में पछतावा था, आत्मग्लानि थी। वे अपने ही निर्णयों पर प्रश्न उठा रहे थे।

 

“मैंने… मैंने ही तुझे इतने वर्षों तक स्नेह दिया, तेरी रक्षा की, तुझे अपने हृदय से लगाया… पर आज वही तू मेरे गले में फाँसी का फंदा बन गई है।”

 

दशरथ की आँखों के सामने बीते हुए दिन घूमने लगे—कैसे उन्होंने कैकेयी पर विश्वास किया, उसे प्रेम दिया… और आज वही प्रेम उनके विनाश का कारण बन गया था।

 

वे और भी टूटे हुए स्वर में बोले—

“जैसे कोई छोटा बालक खेलते-खेलते किसी काले विषैले नाग को पकड़ लेता है, बिना यह जाने कि वह उसे डस लेगा… उसी तरह मैंने भी तुझे अपनाया। मुझे क्या पता था कि एक दिन तू ही मेरी मृत्यु का कारण बनेगी…”

 

अब उनकी पीड़ा और गहरी हो गई थी। यह सिर्फ एक राजा का दुःख नहीं था—यह एक असहाय पिता का विलाप था।

 

“हाय! मैंने जीते-जी ही अपने महान पुत्र को पितृहीन बना दिया… लोग मुझे धिक्कारेंगे… कहेंगे कि यह कैसा पिता था, जिसने एक स्त्री के मोह में आकर अपने ही पुत्र को वन भेज दिया…”

 

उनके मन में समाज का भय नहीं, बल्कि अपनी ही नजरों में गिर जाने का दर्द था।

 

“लोग कहेंगे कि दशरथ मूर्ख है… कामी है… जिसने अपनी पत्नी को प्रसन्न करने के लिए अपने सबसे प्रिय पुत्र को त्याग दिया…”

 

उनकी आवाज़ भर्रा गई।

 

फिर वे राम के जीवन की ओर सोचते हुए बोले—

“मेरा राम… जिसने बचपन से ही वेदों का अध्ययन किया, ब्रह्मचर्य का पालन किया, गुरुजनों की सेवा में अपना जीवन बिताया… वह हमेशा कठिन तप में रहा… और अब जब उसके जीवन में सुख का समय आया है… तब उसे वन में भेज दिया जाएगा…”

 

उनके शब्दों में करुणा उमड़ पड़ी।

 

“जब मैं राम से कहूँगा कि ‘वन चले जाओ’… तो वह बिना एक शब्द कहे, मुस्कुराकर ‘अच्छा’ कह देगा… वह कभी मेरी आज्ञा का विरोध नहीं करेगा…”

 

यही सोचकर दशरथ का हृदय और भी टूट गया।

 

“काश… काश वह मेरी बात न माने! काश वह कह दे कि ‘मैं नहीं जाऊँगा’… तो वही मेरे लिए सबसे प्रिय होता… पर मेरा राम ऐसा नहीं करेगा… वह तो आज्ञाकारी है…”

 

अब उन्हें अपने ही पुत्र की अच्छाई चुभने लगी थी।

 

“यदि राम वन चला गया… तो मैं इस अपराध के साथ जीवित नहीं रह सकूँगा… मेरी मृत्यु निश्चित है…”

 

उन्होंने भविष्य की कल्पना की—

“और जब मैं मर जाऊँगा… तब मेरे प्रियजन—कौसल्या, सुमित्रा… उन पर क्या बीतेगी? क्या तू उन पर अत्याचार करेगी?”

 

उनकी चिंता अब अपने परिवार की ओर मुड़ गई थी।

 

“कौसल्या… वह इस दुःख को सह नहीं पाएगी… वह भी मेरे पीछे-पीछे प्राण त्याग देगी… सुमित्रा का भी यही हाल होगा…”

 

दशरथ का स्वर अब बिल्कुल टूट चुका था।

 

“तू सबको दुःख में डालकर स्वयं सुखी रहना चाहती है… इस पूरे इक्ष्वाकु वंश को शोक में डुबोकर…”

 

वे एक पल को रुके, फिर कटु स्वर में बोले—

 

“यदि भरत को भी यह सब अच्छा लगता हो… तो वह मेरी मृत्यु के बाद मेरा अंतिम संस्कार भी न करे…”

 

यह शब्द उनके आंतरिक आक्रोश और टूटन का चरम थे।

 

फिर वे कैकेयी को देखते हुए बोले—

“मैं तुझे सती और साध्वी समझता था… पर तू तो विष निकली… जैसे कोई सुंदर दिखने वाली मदिरा, जिसे पीने के बाद पता चलता है कि उसमें ज़हर मिला था…”

 

उनकी आँखों में अब विश्वासघात का दर्द था।

 

“तेरे मीठे शब्द… सब झूठ थे… तूने मुझे बहलाया, जैसे कोई शिकारी मधुर संगीत से हिरण को फँसाकर मार देता है… उसी तरह तूने मुझे लुभाकर अब मेरे प्राण ले रही है…”

 

राजा अब पूरी तरह टूट चुके थे।

 

“लोग मुझे नीच कहेंगे… कहेंगे कि एक स्त्री के मोह में पड़कर मैंने अपने पुत्र को बेच दिया…”

 

उनके शब्दों में आत्मग्लानि चरम पर थी।

 

“मेरा राम… जो रथों, हाथियों, घोड़ों पर सवार होकर चलता था… वह अब वन में पैदल कैसे चलेगा?”

 

अब वे कल्पना कर रहे थे राम के वन जीवन की—

 

“जिसके लिए सैकड़ों रसोइये स्वादिष्ट भोजन बनाते थे… वह अब कड़वे-तीखे फलों से अपना पेट भरेगा…”

 

“जो रेशमी वस्त्र पहनता था… वह अब वृक्षों की छाल पहनकर कैसे रहेगा…”

 

हर कल्पना उनके हृदय को चीर रही थी।

 

अंत में वे थककर, टूटकर, लगभग हार मानते हुए बोले—

 

“यह सब तूने किसके कहने पर कहा? किसने तुझे यह कठोर वचन सिखाए?”

 

और फिर एक गहरी निराशा में—

 

“स्त्रियाँ स्वार्थी होती हैं… पर मैं सबको दोष नहीं देता… केवल तुझे दोष देता हूँ…”

दशरथ की वाणी काँप रही थी, पर हर शब्द जैसे उनके हृदय की गहराइयों से निकलकर आ रहा था—
वे कह उठे कि “हे कैकेयी! तू तो ऐसी हो गई है कि अनर्थ में भी अर्थ देख रही है। क्या तुझे मेरे दुख से ही संतोष मिलता है? मैंने तुझे अपने घर में स्थान दिया, तुझे अपना माना—पर क्या तू केवल मुझे पीड़ा देने के लिए ही यहाँ आई थी?”

 

उनकी आँखों में आँसू भर आए। वे आगे बोले—
“तुझे आखिर श्रीराम में कौन-सी बुराई दिखाई देती है? वह राम, जो सबका हित चाहता है, जो कभी किसी का अहित नहीं करता—उसके लिए तेरे मन में इतनी कठोरता कैसे आ गई?”

 

दशरथ का मन अब भय और निराशा से भर उठा था। वे भविष्य की कल्पना करते हुए काँप उठे—
“यदि राम इस संकट में डूब गए, तो केवल मैं ही नहीं, पूरा संसार जैसे अपना संतुलन खो देगा। पिता अपने पुत्रों को त्याग देंगे, स्त्रियाँ अपने पतियों से विमुख हो जाएँगी—सारा संसार जैसे अपने धर्म से भटक जाएगा।”

 

इतना कहते-कहते उनका स्वर भर्रा गया। उनकी स्मृतियों में राम की छवि उभर आई—
“जब मैं अपने उस सुंदर, देवकुमार समान पुत्र राम को देखता हूँ—वह सजे-धजे मेरे सामने आता है—तो मेरा हृदय प्रसन्नता से भर उठता है। ऐसा लगता है जैसे मैं फिर से युवा हो गया हूँ… जैसे जीवन फिर से मुस्कुरा उठा हो।”

 

अब उनकी पीड़ा चरम पर पहुँच चुकी थी। वे बोले—
“सूर्य न भी उगे तो शायद संसार चल सकता है… इन्द्र वर्षा न करें तो भी जीवन किसी तरह चल सकता है… पर यदि राम इस अयोध्या से वन की ओर चले गए—तो कोई भी जीवित नहीं रह पाएगा… मैं तो बिल्कुल नहीं…”

 

दशरथ अब कैकेयी को देखकर जैसे स्वयं को कोसने लगे—
“मैंने अपने ही हाथों अपने विनाश को घर में स्थान दे दिया। तू तो मेरे लिए विषैली नागिन के समान है, जिसे मैंने अपने हृदय से लगाकर रखा… और आज उसी का दंश मुझे मार रहा है…”

 

उनके शब्दों में अब पीड़ा के साथ-साथ निराशा और कटुता भी घुल गई—
“अब तो ऐसा लगता है कि राम और लक्ष्मण के बिना भरत भी सबका नाश कर देगा, और तू उसके साथ इस राज्य पर शासन करेगी… मेरे शत्रु प्रसन्न होंगे और मैं सब कुछ खो दूँगा…”

 

दशरथ का क्रोध भी अब फूट पड़ा—
“हे निर्दयी स्त्री! तू तो ऐसे समय वार कर रही है, जब मैं पहले ही टूट चुका हूँ। जब तू इतनी कठोर बातें कह रही है, तो क्या तेरे मुख के दाँत टूटकर गिर नहीं जाने चाहिए थे?”

 

फिर वे राम के गुणों को याद कर विलाप करने लगे—
“राम ने कभी किसी से कठोर शब्द नहीं कहा… वे तो मधुर वाणी और गुणों के भंडार हैं। ऐसे निष्कलंक पुत्र में तू दोष कैसे ढूँढ़ रही है? वनवास तो उसे दिया जाता है, जो अपराधी हो… पर राम तो निर्दोष हैं…”

 

अब उनकी वाणी पूरी तरह टूट चुकी थी। वे कैकेयी को धिक्कारते हुए बोले—
“तू अपने कुल का कलंक है… चाहे तू लज्जा से मर जाए, आग में जल जाए, विष पी ले या पृथ्वी में समा जाए—पर मैं तेरी इस क्रूर माँग को नहीं मानूँगा…”

 

लेकिन अगले ही क्षण उनका हृदय फिर से पिघल गया।
वे बोले—
“तू ऊपर से मीठी बातें करती है, पर भीतर से कठोर और छलपूर्ण है। तेरे कारण मेरा हृदय जल रहा है… मैं तेरे इस रूप को सह नहीं सकता…”

 

और फिर… वही महान सम्राट, जो कभी किसी के सामने नहीं झुके—आज पूरी तरह टूटकर विनती करने लगे—
“हे देवी… मेरे राम के बिना मैं जीवित नहीं रह सकता… सुख की तो बात ही क्या… जो ज्ञानी पुरुष होते हैं, वे भी पुत्र-वियोग सह नहीं पाते… मैं तुझसे विनती करता हूँ… मेरे ऊपर दया कर…”

 

इतना कहते-कहते दशरथ की शक्ति समाप्त हो गई।
वे अब केवल एक राजा नहीं रहे—वे एक असहाय पिता बन चुके थे।

 

वे कैकेयी के चरणों की ओर झुके—उन्हें पकड़कर अपनी विनती प्रकट करना चाहते थे…
परन्तु उनका शरीर उनका साथ नहीं दे सका।

 

जैसे कोई रोगी किसी वस्तु को पाने के लिए हाथ बढ़ाता है, पर दुर्बलता के कारण बीच में ही गिर पड़ता है—ठीक वैसे ही दशरथ मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े।

 

राजमहल की दीवारें उस करुण दृश्य की साक्षी बन गईं—
जहाँ एक महान सम्राट नहीं, बल्कि एक टूटे हुए पिता का हृदय बिखर गया था…