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(54)
शबला की स्वामी-भक्ति और दिव्य पराक्रम
बहुत प्राचीन समय की बात है। महान् तपस्वी महर्षि वसिष्ठ के आश्रम में शबला नाम की कामधेनु रहती थी। वह साधारण गौ नहीं थी, बल्कि दिव्य शक्तियों से सम्पन्न थी। उसके कारण वसिष्ठ का आश्रम सदा समृद्ध रहता था—ऋषि, मुनि, अतिथि और शिष्यों के लिये भोजन, वस्त्र और आवश्यक वस्तुएँ उसी के द्वारा प्राप्त हो जाती थीं।
राजा विश्वामित्र का लोभ
एक दिन प्रतापी राजा विश्वामित्र अपने विशाल सैनिक दल के साथ वन में भ्रमण करते हुए महर्षि वसिष्ठ के आश्रम पहुँचे। महर्षि ने अतिथि धर्म का पालन करते हुए उनका अत्यन्त आदर-सत्कार किया। आश्चर्य की बात यह थी कि साधारण आश्रम होते हुए भी वहाँ राजा और उनकी विशाल सेना के लिये अद्भुत भोजन और व्यवस्था हो गयी।
राजा विश्वामित्र को यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा कि इतनी व्यवस्था कैसे हो गयी। तब वसिष्ठ ने बताया कि यह सब उनकी कामधेनु शबला के कारण सम्भव है।
यह सुनते ही राजा के मन में लोभ उत्पन्न हो गया। उन्होंने सोचा—“यदि यह दिव्य गौ मेरे पास हो जाये तो मेरे राज्य की समृद्धि अनन्त हो जाएगी।”
उन्होंने वसिष्ठ से विनती की—
“हे मुनिवर! यह गौ मुझे दे दीजिये। बदले में मैं आपको लाखों गौएँ, सोना, रत्न और सम्पत्ति दूँगा।”
किन्तु वसिष्ठ ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“राजन्! यह गौ मेरे आश्रम की आत्मा है। यह मुझे नहीं छोड़ सकती और मैं भी इसे नहीं दे सकता।”
बलपूर्वक छीनने का प्रयास
जब वसिष्ठ किसी भी प्रकार शबला को देने के लिये तैयार नहीं हुए, तब राजा विश्वामित्र के भीतर का अहंकार जाग उठा। उन्होंने अपने सैनिकों को आदेश दिया—
“इस गौ को पकड़कर ले चलो!”
सैनिकों ने उस चितकबरे रंग की पवित्र गौ को बलपूर्वक घसीटना शुरू कर दिया।
शबला का करुण विलाप
राजा के सैनिकों द्वारा इस प्रकार खींचकर ले जायी जाती हुई शबला अत्यन्त दुःखी हो गयी। उसका हृदय मानो टूट गया। वह मन ही मन रोने लगी।
उसके मन में पीड़ा से भरे विचार उठने लगे—
“क्या महर्षि वसिष्ठ ने मुझे त्याग दिया? क्या मैं उनके लिये बोझ बन गयी हूँ? यदि उन्होंने मुझे नहीं छोड़ा, तो ये सैनिक मुझे इस प्रकार क्यों ले जा रहे हैं?”
वह और भी दुखी होकर सोचने लगी—
“मैंने तो अपने स्वामी की सेवा ही की है। फिर ऐसा कौन-सा अपराध हुआ कि वे मुझे इन क्रूर सैनिकों के हाथों सौंप रहे हैं?”
इन दुखद विचारों से उसका हृदय भर आया। वह बार-बार लम्बी साँस लेने लगी।
स्वामी के पास लौटना
अचानक शबला ने अपने भीतर साहस जुटाया। उसने जोर से झटका दिया और उन सैकड़ों सैनिकों की पकड़ से छूट गयी।
फिर वह वायु के समान तीव्र गति से दौड़ती हुई महर्षि वसिष्ठ के पास पहुँची।
उनके चरणों के पास खड़ी होकर वह मेघ के समान गम्भीर और करुण स्वर में रोने लगी।
शबला की पीड़ा
रोते-रोते उसने कहा—
“हे भगवन्! हे ब्रह्मकुमार! क्या आपने मुझे त्याग दिया है? यदि आपने मुझे नहीं छोड़ा, तो ये राजा के सैनिक मुझे आपके पास से दूर क्यों ले जा रहे हैं?”
उसकी आवाज़ में इतना दर्द था मानो कोई छोटी बहन अपने बड़े भाई से शिकायत कर रही हो।
वसिष्ठ का स्नेह
शबला की करुण पुकार सुनकर महर्षि वसिष्ठ का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने प्रेम और दुःख से भरे स्वर में कहा—
“शबले! मैं तुम्हें कैसे त्याग सकता हूँ? तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया।
यह राजा अपने बल और सत्ता के अहंकार में तुम्हें मुझसे छीनकर ले जाना चाहता है।”
फिर उन्होंने दुखी होकर कहा—
“राजा शक्तिशाली हैं। वे क्षत्रिय हैं, पृथ्वी के रक्षक हैं। उनके पास हाथियों, घोड़ों और रथों से भरी विशाल सेना है। उनकी सेना के ध्वज चारों ओर लहरा रहे हैं। इस कारण वे मुझसे अधिक बलवान प्रतीत होते हैं।”
शबला का अद्भुत आत्मविश्वास
महर्षि के वचन सुनकर शबला ने नम्र किन्तु दृढ़ स्वर में उत्तर दिया—
“हे ब्रह्मन्! क्षत्रिय का बल वास्तविक बल नहीं होता। ब्राह्मण का ब्रह्मतेज उससे कहीं अधिक महान और दिव्य होता है।
आपका तेज अपरिमेय है। महापराक्रमी विश्वामित्र भी आपसे अधिक शक्तिशाली नहीं हैं। आपका ब्रह्मबल अद्वितीय है।”
फिर उसने श्रद्धा से कहा—
“मैं तो आपके ब्रह्मतेज से ही शक्तिशाली बनी हूँ। बस आप मुझे आदेश दीजिये। मैं अभी इस दुरात्मा राजा के अहंकार, उसकी सेना और उसके अभिमान को चूर-चूर कर दूँगी।”
वसिष्ठ का आदेश
शबला की दृढ़ता और भक्ति देखकर वसिष्ठ ने शांत स्वर में कहा—
“यदि ऐसा है, तो तुम इस शत्रु-सेना को नष्ट करने वाले वीरों की सृष्टि करो।”
अद्भुत चमत्कार
वसिष्ठ का आदेश मिलते ही शबला ने जोर से हुंकार भरी।
उसकी हुंकार के साथ ही एक अद्भुत चमत्कार हुआ—
अचानक उसके शरीर से सैकड़ों पहलव (पहलव जाति के वीर) उत्पन्न हो गये।
वे सब युद्ध में अत्यन्त पराक्रमी थे। देखते ही देखते उन्होंने विश्वामित्र की सेना पर आक्रमण कर दिया।
विश्वामित्र का क्रोध
अपनी सेना को नष्ट होते देखकर राजा विश्वामित्र का क्रोध भड़क उठा। उनकी आँखें क्रोध से लाल हो गयीं।
उन्होंने अनेक प्रकार के दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया और उन पहलव योद्धाओं का संहार कर डाला।
शबला की दूसरी शक्ति
जब शबला ने देखा कि विश्वामित्र ने उन वीरों को नष्ट कर दिया है, तब उसने फिर से अद्भुत शक्ति का प्रदर्शन किया।
इस बार उसने यवनों और शक जाति के भयंकर योद्धाओं को उत्पन्न कर दिया।
क्षण भर में पृथ्वी उन योद्धाओं से भर गयी।
वे अत्यन्त तेजस्वी और पराक्रमी थे। उनके शरीर की चमक सोने और केसर के समान थी। उन्होंने सुनहरे वस्त्र पहन रखे थे और हाथों में तीखे खड्ग तथा पट्टिश धारण किये थे।
वे मानो प्रज्वलित अग्नि के समान चमक रहे थे।
भयंकर युद्ध
उन वीरों ने विश्वामित्र की सेना पर टूट पड़कर उसे नष्ट करना आरम्भ कर दिया। चारों ओर युद्ध का भयंकर दृश्य छा गया।
तब विश्वामित्र ने फिर अनेक अस्त्रों का प्रयोग किया। उन अस्त्रों की चोट से यवन, काम्बोज और बर्बर जाति के योद्धा भी व्याकुल हो उठे।
वन का वातावरण युद्ध की गर्जना, अस्त्रों की चमक और सैनिकों के शोर से भर गया।