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शीर्षक: कलियुग में अमृत की धारा
नैमिषारण्य का पवित्र वन उस दिन असाधारण रूप से शांत था। विशाल वृक्षों की छाया में फैले आश्रम, बहती हुई गोमती की मंद धारा और यज्ञवेदी से उठता हुआ धुआँ—सब मिलकर वातावरण को दिव्यता से भर रहे थे। ऋषि-मुनि अपने आसनों पर विराजमान थे। उनके मुख पर गहन चिंता की रेखाएँ स्पष्ट थीं। युग बदल रहा था, और वे उस परिवर्तन की आहट को भलीभाँति अनुभव कर रहे थे।
उनके मध्य महात्मा सूतजी विराजमान थे—ज्ञान के सागर, पुराणों के ज्ञाता और धर्म के जीवंत प्रतीक। ऋषियों की दृष्टि उन्हीं पर टिकी थी।
एक वरिष्ठ ऋषि ने करबद्ध होकर कहा,
“भगवन्! आपने हमें अनेक शास्त्रों का मर्म समझाया है। फिर भी हमारे हृदय में एक गहन व्यथा शेष है। यह संसार दुःखों से भरा है। जीव जन्म, जरा और मृत्यु के बंधन में जकड़ा हुआ तड़प रहा है।”
दूसरे ऋषि ने आगे कहा,
“आप कहते हैं कि कलियुग में वेदों के अनुसार चलना कठिन हो जाएगा। धर्म का लोप होगा, पाखंड बढ़ेगा, और मनुष्य लोभ, काम और मोह में डूब जाएगा। तब ऐसे समय में जीवों का उद्धार कैसे होगा?”
सभा में मौन छा गया। ऐसा लग रहा था मानो स्वयं युग की पीड़ा बोल रही हो।
ऋषियों ने एक स्वर में कहा,
“कलियुग में मनुष्य छोटे कद के, अल्पायु और अधिक इच्छाओं वाले होंगे। धर्म से विमुख होकर केवल स्वार्थ में जीएँगे। स्त्रियाँ और पुरुष दोनों ही संयम त्याग देंगे। ब्राह्मण भी पाखंडियों के संग बैठेंगे। ऐसे भयंकर समय में मुक्ति का मार्ग कौन-सा होगा?”
तब सूतजी ने नेत्र मूँद लिए। उनके मुख पर गहरी करुणा और शांति एक साथ झलक उठी। उन्होंने धीमे किंतु दृढ़ स्वर में कहा—
“हे मुनिवरों! आप सभी धन्य हैं, जो इस प्रश्न को हृदय में धारण करते हैं। सुनिए—मैं वही उपाय कहता हूँ जो स्वयं महर्षि नारद ने सनत्कुमार को बताया था।”
सभा एकदम स्तब्ध हो गई।
“कलियुग में,” सूतजी बोले, “जब वेदों के गूढ़ मार्ग धुँधले हो जाएँगे, तब एक ही अमोघ साधन शेष रहेगा—श्रीमद् वाल्मीकि रामायण।”
ऋषियों के नेत्र विस्मय से फैल गए।
“यह केवल एक काव्य नहीं है,” सूतजी ने आगे कहा,
“यह समस्त वेदों का सार है। यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों को देने वाला अमृत है। इसमें भगवान् श्रीराम की लीला है—वे श्रीराम, जो स्वयं सच्चिदानंदस्वरूप परमात्मा हैं, जिनसे काल भी भयभीत रहता है।”
उन्होंने श्रद्धा से सिर झुकाया और बोले—
“श्रीराम ही संसार का आधार हैं। उनके नाम के बिना कोई गति नहीं। कलियुग के समस्त दोष उनके स्मरण मात्र से नष्ट हो जाते हैं।”
ऋषि एकाग्र होकर सुनते रहे।
“रामायण का श्रवण,” सूतजी बोले, “भयंकर पापों को नष्ट कर देता है। दुःस्वप्न, ग्रहों की बाधाएँ, मानसिक क्लेश—सब दूर हो जाते हैं। जिसने इसे सुना, उसने मानो अमृत पान कर लिया।”
एक ऋषि ने संदेह से पूछा,
“भगवन्! क्या घोर पापी भी इसका फल पा सकता है?”
सूतजी मुस्कराए।
“हाँ। जिसने असंख्य पाप किए हों, उपपातकों से घिरा हो—वह भी रामायण श्रवण से शुद्ध हो जाता है। परंतु याद रखो—जिसके भीतर पाप प्रबल होते हैं, वह रामकथा आरंभ होते ही उसका तिरस्कार कर दूसरी तुच्छ कथाओं में उलझ जाता है।”
फिर उन्होंने गूढ़ रहस्य खोला—
“जिस मनुष्य का पूर्वजन्म का पुण्य जाग्रत होता है, उसी के हृदय में रामायण के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है।”
वन में शीतल वायु बह चली।
“कार्तिक, माघ और चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में,” सूतजी बोले,
“नौ दिनों तक रामायण की अमृतमयी कथा सुननी चाहिए। यह नवाह-पारायण स्वर्ग और मोक्ष दोनों देने वाला है।”
उन्होंने उदाहरण दिया—
“राजा सौदास, जो महर्षि गौतम के शाप से राक्षस बन गए थे, वे भी रामायण श्रवण से मुक्त हो गए। सोचो—जिसने राक्षस भाव धारण कर लिया था, वह भी शुद्ध हो गया, तो फिर सामान्य मनुष्य क्यों नहीं?”
ऋषियों के नेत्र नम हो गए।
“जिस घर में प्रतिदिन रामायण की कथा होती है,” सूतजी ने कहा,
“वह घर तीर्थ बन जाता है। वहाँ पाप टिक नहीं पाते। कलियुग उस घर को छू नहीं सकता।”
उन्होंने अंत में दृढ़ स्वर में कहा—
“घोर कलियुग में जो श्रीराम नाम का आश्रय लेता है, वही कृतार्थ है। रामायण का श्रवण करते-करते मनुष्य अपने इक्कीस पीढ़ियों सहित श्रीराम के परमधाम को प्राप्त करता है—जहाँ न शोक है, न भय।”
सभा में पूर्ण निस्तब्धता छा गई।
नैमिषारण्य का वन मानो स्वयं इस कथा को हृदय में धारण कर चुका था। ऋषियों को उत्तर मिल चुका था। कलियुग का अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो—उसमें रामायण अमृत-धारा बनकर सदा बहती रहेगी।
और उसी अमृत में मानवता का उद्धार निहित है।