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शोक से श्लोक तक — रामायण का जन्म

 

यह उस दिव्य क्षण की कथा है, जब करुणा ने काव्य का रूप लिया और शोक से संसार का प्रथम महाकाव्य जन्मा।

देवर्षि नारद के मुख से श्रीराम के पवित्र और सम्पूर्ण चरित्र का श्रवण कर धर्मात्मा, वाणीविशारद महर्षि वाल्मीकि का हृदय भावों से भर उठा। उन्होंने अपने शिष्यों सहित नारदजी का यथोचित पूजन किया। नारदजी ने आकाशमार्ग से प्रस्थान किया और उनके जाने के कुछ ही समय बाद महर्षि वाल्मीकि तमसा नदी के तट की ओर चल पड़े।

तमसा का तट अत्यंत शांत, स्वच्छ और मनोहारी था। वहाँ का जल निर्मल था, मानो किसी सत्पुरुष का शुद्ध हृदय। घाट पर पहुँचकर वाल्मीकि ने अपने प्रिय शिष्य भरद्वाज से कहा—

“वत्स! यह स्थान कितना पवित्र और सुंदर है। यहीं मेरा कलश रखो, मैं इसी तीर्थ में स्नान करूँगा।”

भरद्वाज ने गुरु को वल्कल वस्त्र दिया। स्नान से पूर्व महर्षि वाल्मीकि उस वन की शोभा निहारते हुए विचरने लगे। तभी उनकी दृष्टि क्रौञ्च पक्षियों के एक प्रेमिल जोड़े पर पड़ी। वे दोनों मधुर स्वर में कलरव कर रहे थे और एक-दूसरे से कभी अलग नहीं होते थे।

अचानक वहाँ एक निषाद आया—निर्दय और पापपूर्ण वृत्ति वाला। उसने बिना किसी कारण उस जोड़े के नर पक्षी को बाण से मार गिराया। घायल पक्षी रक्तरंजित होकर भूमि पर तड़पने लगा। अपने प्रिय की मृत्यु देखकर क्रौञ्ची का हृदय विदीर्ण हो उठा। वह करुण क्रंदन करने लगी। उसका विलाप वन में गूँज उठा।

यह दृश्य देखकर महर्षि वाल्मीकि का हृदय दया से भर गया। करुणा से अभिभूत होकर उनके मुख से अनायास ही वाणी फूट पड़ी—

“निषाद! तूने निर्दोष और प्रेम में लीन इस पक्षी की हत्या की है, इसलिए तुझे कभी शांति न मिले।”

यह कहकर वे स्वयं चकित हो गए। उन्होंने मन ही मन सोचा—

“अहो! मैंने यह क्या कह दिया? यह तो शोक से उत्पन्न वाणी है।”

परंतु जब उन्होंने उस वाक्य पर विचार किया, तो पाया कि वह चार चरणों में बँधा है, प्रत्येक चरण में समान अक्षर हैं और उसे लय में गाया जा सकता है। तब उन्होंने भरद्वाज से कहा—

“वत्स! शोक से निकला मेरा यह वाक्य तो श्लोक बन गया है।”

शिष्य भरद्वाज आनंदित हो उठा और बोला—

“गुरुदेव! यह निश्चय ही श्लोक है।”

स्नान के पश्चात महर्षि आश्रम लौट आए। किंतु उनका मन बार-बार उसी श्लोक और क्रौञ्च पक्षी की पीड़ा में उलझ जाता था। वे उसी भाव में लीन थे कि तभी सृष्टिकर्ता ब्रह्मा स्वयं उनके आश्रम पधारे।

ब्रह्माजी को सामने देखकर वाल्मीकि विस्मय से भर उठे। उन्होंने श्रद्धापूर्वक पूजन किया और आसन ग्रहण किया। पर उनका मन अब भी उसी घटना में डूबा हुआ था। उन्होंने वही श्लोक ब्रह्माजी के सामने दोहरा दिया और पुनः अपने कथन के औचित्य पर शोक करने लगे।

तब ब्रह्माजी मंद-मंद मुस्कुराए और बोले—

“महर्षे! तुम्हारे मुख से निकला यह श्लोक मेरे संकल्प से उत्पन्न हुआ है। इसमें कोई दोष नहीं। यही प्रथम श्लोक है।”

फिर ब्रह्माजी ने उन्हें आदेश दिया—

“तुम श्रीराम के सम्पूर्ण चरित्र का काव्यबद्ध वर्णन करो। जैसा तुमने नारदजी से सुना है, वैसा ही लिखो। जो कुछ गुप्त या प्रकट है, वह सब तुम्हें स्वतः ज्ञात हो जाएगा। तुम्हारी वाणी में असत्य नहीं होगा।”

उन्होंने यह भी कहा—

“जब तक पृथ्वी पर नदियाँ और पर्वत रहेंगे, तब तक रामायण की कथा संसार में गूँजती रहेगी। और जब तक यह कथा प्रचलित रहेगी, तुम लोकों में स्वतंत्र रूप से विचरण करोगे।”

यह कहकर ब्रह्माजी अंतर्धान हो गए। आश्रम में उपस्थित सभी शिष्य विस्मय और आनंद से भर उठे। वे बार-बार उस श्लोक का गान करने लगे और आपस में कहने लगे—

“गुरुदेव के हृदय का शोक, वाणी से निकलकर श्लोक बन गया।”

तभी महर्षि वाल्मीकि के मन में दृढ़ संकल्प जागा—

“मैं ऐसे ही श्लोकों में सम्पूर्ण रामकथा की रचना करूँगा।”

और इस प्रकार करुणा से जन्मा श्लोक आगे चलकर हजारों श्लोकों वाला महाकाव्य बना—रामायण, जो धर्म, करुणा, सत्य और आदर्श का अमर ग्रंथ है।

यहीं से आरंभ हुआ वह काव्य, जिसने युगों-युगों तक मानवता को जीवन का मार्ग दिखाया।