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🌺 जब देवताओं ने वन में सेना उतारी

(श्रीराम-काज के लिये वानरवीरों की दिव्य उत्पत्ति)

 

जब महामनस्वी भगवान् विष्णु ने अयोध्या के प्रतापी राजा दशरथ के पुत्ररूप में पृथ्वी पर अवतार लिया, तब त्रिलोक के कण-कण में एक अदृश्य हलचल फैल गयी। देवताओं को ज्ञात था—अब अधर्म का अंत समीप है, रावण-वध का समय निकट है। पर यह भी उतना ही सत्य था कि पृथ्वी पर अवतरित भगवान् को लोक-लीला में सहायक शक्तियों की आवश्यकता होगी।

 

इसी महायोजना के सूत्रधार थे चतुर्मुख भगवान् ब्रह्मा। एक दिव्य सभा में, जहाँ देवलोक का तेज चारों ओर आलोकित हो रहा था, ब्रह्माजी ने समस्त देवताओं को संबोधित किया। उनका स्वर गंभीर था, पर उसमें करुणा और दूरदर्शिता समाई हुई थी—

 

“देवगण! विष्णु अब श्रीराम के रूप में पृथ्वी पर हैं। वे सत्यप्रतिज्ञ हैं, शूरवीर हैं, और हम सबके हितैषी हैं। रावण जैसे दंभी और मायावी असुर का वध केवल बल से नहीं, अपितु विवेक, साहस और सामूहिक शक्ति से होगा। अतः तुम सब अपने-अपने अंश से ऐसे पुत्रों की सृष्टि करो, जो बलवान हों, इच्छानुसार रूप धारण कर सकें, माया को पहचानते हों, वेग में वायु के समान हों और पराक्रम में स्वयं विष्णु के तुल्य हों।”

 

ब्रह्मा की वाणी आगे बढ़ी—

“वे दिव्य शरीरधारी हों, अमृतभोजी देवताओं के समान अस्त्र-शस्त्र विद्या से सम्पन्न हों, किसी से परास्त न होने वाले हों और युद्ध-कौशल में निपुण हों। अप्सराओं, गन्धर्व-पत्नियों, यक्ष और नाग कन्याओं, विद्याधरियों, किन्नरियों, रीछों और वानरियों के गर्भ से वानररूप में ऐसे पुत्र उत्पन्न हों, जो श्रीराम के कार्य में सहायक बनें।”

 

सभा में मौन छा गया। तभी ब्रह्माजी ने एक रहस्य भी प्रकट किया—

“ऋक्षराज जाम्बवान् तो पहले ही सृजित हो चुके हैं। एक बार जब मैं जँभाई ले रहा था, उसी क्षण वे सहसा मेरे मुख से प्रकट हो गये थे—ज्ञान और अनुभव के साक्षात् भंडार।”

 

ब्रह्मा की आज्ञा पाते ही देवताओं ने उसे शीरोधार्य किया। देवलोक की दिव्य शक्तियाँ अब वन-प्रदेशों की ओर प्रवाहित होने लगीं। ऋषि, सिद्ध, नाग, विद्याधर, चारण—सबने अपने-अपने अंश से वानर और भालुओं के रूप में अद्भुत वीरों को जन्म दिया।

 

देवराज इन्द्र से उत्पन्न हुए वानरराज वाली—महेन्द्र पर्वत के समान विशाल और अपराजेय। तपस्वियों में श्रेष्ठ सूर्यदेव से जन्मे सुग्रीव—तेजस्वी, नीतिज्ञ और धैर्यवान। देवगुरु बृहस्पति से उत्पन्न हुए तार—बुद्धि में सबसे श्रेष्ठ। कुबेर के पुत्र गन्धमादन—ऐश्वर्य और बल का अद्भुत संगम। विश्वकर्मा से जन्मे नल—सेतु-निर्माण की अद्वितीय प्रतिभा से युक्त।

 

अग्निदेव के पुत्र नील—तेज, यश और पराक्रम में अप्रतिम। अश्विनीकुमारों से जन्मे मैन्द और द्विविद—रूप और बल में अनुपम। वरुण से उत्पन्न सुषेण और पर्जन्य से शरभ—मेघगर्जना के समान शक्तिशाली।

 

और फिर प्रकट हुए वायुदेव के औरस पुत्र—हनुमान। वज्र के समान दृढ़ शरीर, गरुड़ के समान वेग, बुद्धि और बल में सर्वश्रेष्ठ। वे केवल वानर नहीं थे—वे स्वयं राम-काज की जीवंत चेतना थे।

 

हजारों नहीं, लाखों वानर उत्पन्न हुए। कोई पर्वत के समान विशाल, कोई सिंह और व्याघ्र के समान दर्पी। वे नख-दंतों को शस्त्र बनाकर लड़ सकते थे, पर्वत उठा सकते थे, समुद्र को क्षुब्ध कर सकते थे। वे आकाश में प्रवेश कर सकते थे, बादलों को पकड़ सकते थे और महासागरों को लाँघ सकते थे।

 

उनकी गर्जना से आकाश काँप उठता था। सिंहनाद से उड़ते पक्षी भूमि पर गिर पड़ते थे। ऐसे महाकाय यूथपति करोड़ों की संख्या में उत्पन्न हुए, और उनसे भी श्रेष्ठ वानर-वीर आगे जन्मे। ऋक्षवान् पर्वत, विविध पर्वत-शिखर और घने वन उनके निवास बने।

 

इन सबके केंद्र में थे—इन्द्रपुत्र वाली और सूर्यनन्दन सुग्रीव। समस्त वानरयूथपति उनके अधीन थे, और साथ ही नल, नील, हनुमान जैसे महावीर सरदारों का आश्रय लेते थे। वे गरुड़ के समान बलशाली और युद्धकला में प्रवीण थे। वन में विचरते समय सिंह, व्याघ्र और महा-नाग भी उनके मार्ग से हट जाते थे।

 

महाबाहु वाली ने अपने बाहुबल से वानरों, रीछों और लंगूरों की रक्षा की। भिन्न-भिन्न रूप, रंग और लक्षणों वाले ये वानर समस्त पृथ्वी में फैल गये—पर्वतों, वनों और समुद्रों तक।

 

मेघसमूह और पर्वत-शिखरों के समान विशालकाय, भयंकर रूप वाले, अपार बल से युक्त—ये सभी वीर केवल एक ही उद्देश्य से प्रकट हुए थे—

भगवान् श्रीराम की सहायता के लिये।

 

उन वानरवीरों से पृथ्वी भर गयी। यह केवल एक सेना की उत्पत्ति नहीं थी—यह धर्म की सामूहिक चेतना का अवतरण था, जो रावण जैसे अधर्म के प्रतीक को मिटाने के लिये वन से उठ खड़ी हुई थी।