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 श्री अग्रसेन वंदना

 

श्री अग्रसेन चालीसा

 

श्रीगुरु शीश नवाय कर धर उर लक्ष्मी ध्यान 

श्री अग्रसेन महाराज का चरित करू गुणगान

 

चौपाई-

 

जय अग्रसेन स्वामी हितकारी, सत्यव्रत अहिंसा धारी
रविकुल भूषण पर उपकारी, जीव की रक्षा शिक्षा थारी
परम अहिंसक शुभ गुण धाम, जय जय हो हे कृपा निधान
जन्म हुआ प्रतापपुर माही, आश्विन शुक्ल प्रथम तिथि पाही
रविवार मध्य था काल, कन्या लग्न गुरु पुष्य विशाल
पिता वल्लभसेन महान, माता भगवती परम सुजान
इक्ष्वाकु वंश अभिराम, जिसमें पैदा हुए श्रीराम
हुआ जन्म माँ गोद खिलाया, पिताश्री ने लाड़ लड़ाया
आये थे पंडित अतिज्ञानी, लक्षण देख कहा अग्रगामी
अग्रसेन नाम था धारा, अग्रगण्य ही बना सुखारा
पांच बरस अवस्था धारी, गुरुकुल जाने की तैयारी
ताड्य ऋषि थे अतिज्ञानी, अग्र शिष्य पाय हरषानी
थोड़े काल शिक्षा सब पायी, ज्ञान गरिमा चहुंदिशी दिखाई
चौदह बरस के हुए थे बाल, आयोजन एक हुआ विशाल
स्वस्तिवाचन ब्राह्मण किन्हा, उनसे आशीर्वाद है लिन्हा
अस्त्र शस्त्र सबके ज्ञाता, शास्त्र के भी बने विख्याता
ऋषिकन्या शुभा बचाई, सठ राजा की करी धुनाई
शिक्षा पाय प्रतापपुर आये, देख प्रजा अति सुहाये
महाभारत युद्ध तेहि काला, युद्ध करने गए नृप लाला
अमित प्रभाव युद्ध दिखलाया, श्रीकृष्ण का प्रेम था पाया
पिता मृत्यु का दुख भी आया, श्रीकृष्ण ने तब समझाया
युद्ध में विजय पांडव पायी, अग्रसेन की पीठ थपाई 
युद्ध भूमि से नगर पधारे, मंत्री मिल आपस में विचारे 
राजतिलक की हुई तैयारी, चाचा की गई मति थी मारी 
अग्रसेन को बंदी बनाया, फिर भी सत्य को नहीं बिसराया 
बंदीगृह से बाहर आये, गर्ग मुनि आश्रम नियराये 
गर्गमुनि ने ज्ञान है दिन्हा, उसके तम को दूर है किन्हा 
महालक्ष्मी प्रभाव बताया, सुनकर अग्रसेन हरसाया 
कठिन तपस्या किन्ही गौसाई, महालक्ष्मी ने दर्श दिखाई 
मनचाहा वरदान है दिन्हा, सकल सुमंगल माता किन्हा 
आग्रेय नगरी तुरत बसाई, सत्य धर्म पुरुषार्थ बताई 
गुरु आज्ञा से कार्य है किन्हा, सबजन को आनंद है दिन्हा 
गुरुआज्ञा से मणिपुर आए, नागलोक देख हरषाए 
नागलोक के राजा महीधर, उनकी पुत्री थी अति सुंदर 
नाम माधवी परम सयानी, सकल गुणों की वह थी खानी 
माधवी से ब्याह रचाया, सब जन ने आनंद मनाया 
देवराज इंद्र थे मानी, काम क्रोध से बने अभिमानी 
ईर्ष्यावश क्रोधित हुए भारी, अग्रसेन से युद्ध विचारी 
महालक्ष्मी ने कृपा है किन्ही, इंद्र को अनुशासन दिन्ही 
इन्द्र को बुद्धि शुभप्रद आयी, अग्रसेन से करी मिताई 
अग्रसेन नर श्रेष्ठ बताए, तीन लोक में महिमा गाए 
अग्रसेन निज वंश बढ़ाया, सबजन के मन आनंद छाया 
हुए पुत्र अठारह भाई, एक पुत्री शुभलक्षिणी आयी 
वंश कर यज्ञ महामही किन्हा, पशुबलि देख हृदय भर लीन्हा 
बलि देख मन ग्लानि भारी, क्षत्रियता तभी तज डारी 
सत्रह यज्ञ क्षात्र विधि करहिं, अठारहवां वैश्य अनुशरहिं 
हाथ उठायै तभी प्रण लिन्हा, सत्य अहिंसा मार्ग चिन्हा 
सकल भुवन में नाम कमाई, जय जय जय अग्रसेन गुसाईं
गृहस्थ छोड़ वनवास है धारो, अक्षय धाम तभी स्वीकारो 
महालक्ष्मी नहीं कभी बिसारी, सत्यलोक पहुंचे व्रतधारी 
धन्य धन्य हैं वे नर नारी, जिनके मन रहते हितकारी 
शुक्रवार दिवस अति पावन, महालक्ष्मी को परम सुहावन 
अग्रसेन वंदना है गाई, मन में है अति हर्ष उच्छाही 
रोग शोक भय ताप मिटावहिं, सबके बिगड़े काज संवारहिं 
अग्र चरित नित गावे जो वाणी, होवे सफल मनोरथ प्राणी
 
इति श्री