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शीर्षक: शब्दों का विष
महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। अठारह दिनों तक चली वह विभीषिका, जिसने आर्यावर्त की आत्मा को रक्त में डुबो दिया था, अब इतिहास बन चुकी थी। रणभूमि की धूल बैठ गई थी, पर उसके नीचे दबा हुआ शोक अब भी जीवित था—करुण, मौन और असहनीय।
हस्तिनापुर, जो कभी विजय-नाद और उत्सवों से गूँजता था, अब एक जीवित श्मशान में परिवर्तित हो चुका था। राजमहल के गलियारों में अब रत्नों की झंकार नहीं, बल्कि विधवाओं के विलाप की प्रतिध्वनि थी। जहाँ कभी वीरों की पदचाप सुनाई देती थी, वहाँ अब केवल सूनी दृष्टियाँ और टूटे सपने थे। अनाथ बालक स्तब्ध खड़े थे—जिनकी आँखों में प्रश्न थे, उत्तर नहीं।
इसी महल के एक एकांत कक्ष में द्रौपदी बैठी थीं।
वह द्रौपदी, जिनकी आँखों में कभी अग्नि की ज्वाला और स्वर में सिंहनाद हुआ करता था, अब पूर्णतः निस्तेज थीं। आयु उनकी मध्य अवस्था में थी, किंतु युद्ध ने उन्हें अस्सी वर्ष की वृद्धा बना दिया था। शरीर नहीं—उनकी आत्मा थक चुकी थी। वे शून्य में ताकती बैठी थीं, जैसे जीवन उनसे सब कुछ छीन कर चला गया हो। आँसू भी मानो उनका साथ छोड़ चुके थे।
तभी कक्ष के द्वार पर धीमी-सी आहट हुई।
द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण भीतर प्रविष्ट हुए।
द्रौपदी ने जैसे ही उन्हें देखा, वर्षों से संचित धैर्य का बाँध टूट गया। वह संयम, जो उन्होंने एक महारानी बनकर, एक युग की नारी बनकर धारण किया था—क्षण भर में बिखर गया। वह दौड़ पड़ीं और कृष्ण से लिपट गईं। शब्दों के बिना ही उनका सारा दुख, सारा पश्चाताप, सारा विषाद आँसुओं में बह निकला।
कृष्ण ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने कोई उपदेश नहीं दिया। वे केवल खड़े रहे—उनके सिर पर स्नेह से हाथ रखते हुए। वे जानते थे कि कुछ क्षण ऐसे होते हैं जहाँ शब्द व्यर्थ हो जाते हैं, और मौन ही सबसे बड़ी सांत्वना बन जाता है।
कुछ समय बाद, जब द्रौपदी की सिसकियाँ धीमी हुईं, कृष्ण ने उन्हें धीरे से अलग किया और पास के पलंग पर बैठा दिया। स्वयं भी सामने बैठ गए।
रुँधे गले से द्रौपदी ने कहा,
“सखा… यह क्या हो गया? मैंने कभी नहीं सोचा था कि न्याय का मार्ग इतनी लाशों से होकर जाएगा। क्या इसी के लिए मैंने अपने हृदय में प्रतिशोध की अग्नि जलाए रखी थी?”
कृष्ण का स्वर शांत था, पर उसमें गंभीरता थी।
“पांचाली, नियति सरल नहीं होती। वह हमारी भावनाओं से नहीं, हमारे कर्मों से बंधी होती है। तुम प्रतिशोध चाहती थीं—और वह मिला। दुर्योधन, दुःशासन, कौरव वंश—सब नष्ट हो गया। तुम्हें तो अपनी विजय पर प्रसन्न होना चाहिए।”
ये शब्द द्रौपदी के हृदय में बाण की तरह लगे।
“क्या तुम मेरे घावों पर मरहम लगाने आए हो, कृष्ण,” वह तड़प उठीं, “या उन पर नमक छिड़कने?”
कृष्ण की आँखों में करुणा थी, पर वाणी में सत्य की कठोरता।
“मैं मरहम नहीं, दर्पण लाया हूँ, द्रौपदी। हम आवेश में अपने कर्म करते हैं, पर उनके परिणामों को नहीं देखते। और जब वे परिणाम सामने आते हैं, तब उन्हें रोकना किसी के वश में नहीं रहता।”
द्रौपदी की दृष्टि काँप उठी।
“तो क्या इस महाविनाश की उत्तरदायी मैं हूँ?”
कृष्ण ने सिर हिलाया।
“नहीं। स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो। पर यह भी असत्य नहीं कि यदि तुमने कुछ क्षणों में संयम और दूरदर्शिता दिखाई होती, तो शायद यह पीड़ा इतनी गहरी न होती।”
द्रौपदी ने असहाय स्वर में पूछा,
“मैं क्या कर सकती थी?”
कृष्ण ने स्मृतियों के द्वार खोल दिए।
“तुम बहुत कुछ कर सकती थीं, सखा। स्मरण करो—अपना स्वयंवर। जब कर्ण ने धनुष उठाया था, तब तुमने उसके सूतपुत्र होने का उपहास किया। यदि तुमने उसे अपमानित न किया होता, तो उसका आहत स्वाभिमान प्रतिशोध में न बदलता।”
द्रौपदी का मस्तक झुक गया।
कृष्ण ने आगे कहा,
“और जब कुंती के एक वाक्य ने तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बना दिया, तब यदि तुमने मौन न साधा होता, यदि तुमने अन्याय के विरुद्ध स्वर उठाया होता—तो बहुत कुछ बदल सकता था। मौन भी कभी-कभी सबसे बड़ा अपराध बन जाता है।”
द्रौपदी कुछ कहना चाहती थीं, पर शब्द गले में अटक गए।
कृष्ण की दृष्टि और भी गहरी हो गई।
“और वह क्षण… इंद्रप्रस्थ का मायावी महल। जब दुर्योधन गिर पड़ा था, और तुम हँसी थीं। ‘अंधों के पुत्र अंधे ही होते हैं’—वह एक वाक्य। केवल एक।”
उनका स्वर धीमा हो गया।
“उसी वाक्य ने दुर्योधन के भीतर ऐसी आग जलाई, जिसने चीरहरण, जुए और इस युद्ध को जन्म दिया।”
कक्ष में सन्नाटा छा गया।
फिर कृष्ण बोले—वह वाक्य, जो द्रौपदी के जीवन का सबसे बड़ा पाठ बन गया।
“द्रौपदी, शब्द केवल ध्वनि नहीं होते। वे भी कर्म होते हैं। बाण का घाव भर सकता है, पर शब्दों का नहीं। शब्दों का विष केवल बोलने वाले को नहीं, पूरे संसार को जला सकता है।”
उन्होंने अंतिम सत्य कहा—
“इस सृष्टि में मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है, जिसका ज़हर उसके दाँतों में नहीं, उसके शब्दों में होता है।”
द्रौपदी अवाक् रह गईं।
युद्ध समाप्त हो चुका था। पर उस दिन, उस कक्ष में—एक और युद्ध समाप्त हुआ था।
अज्ञान का युद्ध।
और ज्ञान का एक नया अध्याय आरंभ हो चुका था।