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जहाँ लीला ने द्वार खटखटाया और त्याग ने सिंहासन छोड़ दिया
(बद्रीनाथ–केदारनाथ की हृदयस्पर्शी गाथा)
भूमिका
यह कथा केवल बद्रीनाथ धाम की स्थापना की नहीं है। यह कथा ईश्वर के हृदय की है। यह कथा बताती है कि ईश्वर जब बालक बनकर रोते हैं, और ईश्वर ही जब पिता बनकर सब कुछ छोड़ देते हैं, तो उस क्षण सृष्टि स्वयं नतमस्तक हो जाती है। यह हरि की लीला और हर के त्याग की अमर कथा है।
1. वैकुण्ठ में उठा एक प्रश्न
वैकुण्ठ लोक सदा की भाँति प्रकाश से जगमगा रहा था। शेषनाग की अनंत शय्या पर भगवान विष्णु विराजमान थे। माता लक्ष्मी उनके चरणों को सहलाती हुई सेवा में लीन थीं। चारों ओर दिव्य शांति थी।
उसी समय देवर्षि नारद वहाँ पहुँचे— “नारायण… नारायण…”
नारद जी ने प्रणाम किया, पर आज उनके स्वर में गंभीरता थी। उन्होंने धीरे से कहा— “प्रभु… आप संसार को तप, संयम और त्याग का उपदेश देते हैं। आप कहते हैं—सुख से नहीं, साधना से ईश्वर मिलता है। पर स्वयं आप वैकुण्ठ में सुख, वैभव और सेवा के बीच विराजमान हैं।
यदि मनुष्य आपसे प्रेरणा ले, तो वह त्याग कहाँ से सीखे?”
यह प्रश्न कटु नहीं था, यह भक्ति का साहस था।
भगवान विष्णु कुछ क्षण मौन रहे। उनकी आँखों में करुणा उतर आई। वे समझ गए— यह प्रश्न नहीं, संसार की पुकार है।
2. नारायण का मौन संकल्प
भगवान विष्णु ने धीरे से कहा— “देवर्षे… यदि उपदेश शब्दों से नहीं पहुँचा, तो अब वह जीवन से पहुँचेगा।”
माता लक्ष्मी का हृदय भर आया। उन्होंने कहा— “स्वामी! क्या आप हमें छोड़कर जाएँगे?”
विष्णु जी मुस्कुराए— “प्रिये… यह छोड़ना नहीं है, यह सिखाने जाना है।” और उसी क्षण नारायण ने पृथ्वी पर अवतरण का संकल्प लिया।
3. हिमालय की गोद में
हिमालय—
जहाँ मौन भी तप करता है,
जहाँ श्वास भी साधना बन जाती है।
अलकनंदा के तट पर, नर–नारायण पर्वतों के बीच, भगवान विष्णु रुके। वहाँ की वायु में ऐसी शांति थी कि हृदय अपने आप झुक जाए।
नारायण बोले— “यही स्थान है… जहाँ तप स्वयं मेरा मार्ग बनेगा।”
पर वहीं एक छोटी-सी कुटिया थी। द्वार पर त्रिशूल खड़ा था। यह महादेव और माता पार्वती का निवास था।
4. नारायण का द्वंद्व
भगवान विष्णु जानते थे— यदि वे शिव से कहें, तो महादेव बिना एक क्षण सोचे यह स्थान सौंप देंगे। पर नारायण चाहते थे कि संसार देखे— “ईश्वर भी तभी पाता है जब वह स्वयं को छोटा बना ले।”
और तभी जन्म हुई लीला की।
5. एक रोता हुआ शिशु
अगले ही क्षण वह नारायण एक नन्हे शिशु बन गए। न कोई आभूषण, न कोई तेज प्रकट। केवल भूख से रोता हुआ एक असहाय बालक। वह बालक कुटिया के द्वार पर लेटकर रोने लगा। उस रुदन में ऐसी वेदना थी कि पत्थर भी पिघल जाए।
6. माँ की ममता
शिव–पार्वती वन-विहार से लौट रहे थे। अचानक माता पार्वती रुक गईं। उनकी आँखें भर आईं। “नाथ… क्या आप सुन रहे हैं? कोई शिशु रो रहा है।”
त्रिकालदर्शी शिव सब समझ गए। उन्होंने कहा— “उमा… यह साधारण बालक नहीं है। यह माया है।”
पर माँ माया नहीं समझती, माँ केवल आँसू समझती है। पार्वती जी दौड़ पड़ीं।
7. जब ईश्वर माँ की गोद में आया
जैसे ही माता पार्वती ने उस बालक को उठाया— उसका रोना थम गया। उसने माँ की ओर देखा और मुस्कुरा दिया। उस मुस्कान में पूरा ब्रह्मांड था। पार्वती जी का हृदय पूरी तरह बँध गया। वे बालक को कुटिया में ले आईं।
8. द्वार जो भीतर से बंद हो गया
कुछ समय बाद शिव–पार्वती स्नान हेतु गए। जैसे ही वे ओझल हुए— बालक उठा। अब वह बालक नहीं था, अब वह नारायण था। उन्होंने कुटिया का द्वार भीतर से बंद कर लिया।
9. महादेव का निर्णय
लौटने पर द्वार नहीं खुला। माता पार्वती घबरा गईं।
तब शिव बोले— “उमा… यही होना था। वह बालक स्वयं नारायण हैं।”
पार्वती जी काँप उठीं— “तो क्या हम सब कुछ खो देंगे?”
10. त्याग, जो ईश्वर को भी ईश्वर बना दे
महादेव मुस्कुराए। वह मुस्कान त्याग की थी। उन्होंने कहा— “यदि मेरे आराध्य मेरे द्वार पर आकर बालक बन गए… तो मैं उन्हें यह स्थान क्यों न दूँ?”
“अब यह भूमि बद्रीनाथ कहलाएगी। और हम केदार की निर्जन ऊँचाइयों में वास करेंगे।”
और उसी क्षण महादेव ने अपना घर, अपनी सुविधा, अपनी प्रिय कुटिया सब कुछ छोड़ दिया।
11. आँसू जो तीर्थ बन गए
कहा जाता है— महादेव जब वहाँ से चले, तो अलकनंदा की धाराएँ और शीतल हो गईं। वह भूमि त्याग से पवित्र हो गई।
कथा की सीख (Moral)
💠 1. ईश्वर पाने के लिए बड़ा नहीं, छोटा बनना पड़ता है। नारायण बालक बने—तभी द्वार खुला।
💠 2. सच्चा प्रेम अधिकार नहीं, त्याग माँगता है। महादेव ने देकर पाया।
💠 3. हरि और हर एक-दूसरे के बिना पूर्ण नहीं।
💠 4. जिस भूमि में त्याग की नींव हो, वहीं ईश्वर स्थायी रूप से वास करते हैं। इसीलिए कहा जाता है— केदार के बिना बद्री अधूरा है।
।। जय बद्रीविशाल ।।
।। जय बाबा केदार ।।