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🌸 जब राधारानी ने स्वयं मेहमाननवाज़ी की🌸
🌿 भूमिका (भावभूमि)
ब्रज कोई साधारण भूमि नहीं है।
यहाँ पैर नहीं, भाव चलते हैं।
यहाँ तर्क नहीं, तड़प सुनी जाती है।
और यहाँ की स्वामिनी श्री राधारानी भक्त के शब्द नहीं, उसके मन की थरथराहट पढ़ लेती हैं।
यह कथा है मज़ाक में कही बात को पुकार मान लेने वाली करुणामयी किशोरी जी की।
🌼 कथा
1. थकान, बिछुड़ना और बरसाने की ओर
यमुना जी के पावन कछार में तीन विरक्त साधु ब्रज-चौरासी कोस की यात्रा पर निकले थे।
तीनों के मुख पर हरिनाम था,
पैरों में ब्रज की रज,
और हृदय में वैराग्य।
पर शरीर भी तो हाड़मांस का है। चलते-चलते जब वृद्ध साधु की साँसें थकने लगीं, तो एक गाँव के पास वे रुक गए। धीरे से बोले— “वत्सो… अब देह साथ नहीं दे रही। मैं यहीं मंदिर में रुकूँगा। तुम दोनों युवा हो, तुम बरसाना जाओ… मेरी ओर से भी लाडली जी को प्रणाम कर देना।”
दोनों साधु वृद्ध महात्मा के चरणों में नतमस्तक हुए और बरसाने की ओर बढ़ चले।
2. भूख, पहाड़ी और वह मासूम-सी बात
संध्या ढल चुकी थी। गोधूलि बेला में गायें अपने घर लौट रही थीं और दूर भानुकूट पर्वत स्वर्णिम आभा में नहाया हुआ दिख रहा था। भूख अब असहनीय हो चली थी। एक साधु बोला—
“भाई, रात हो जाएगी।
माधुकरी कहाँ माँगेंगे?”
दूसरा साधु मुस्कुराया। मन में न जाने कौन-सा भाव उमड़ा और उसने हँसी में कह दिया— “अरे! हम कोई साधु थोड़े हैं, हम तो राधारानी के मेहमान हैं। अगर वो हमें भूखा सुलाएँगी, तो बदनामी उनकी होगी। खिलाएँगी तो खा लेंगे, नहीं तो चरणामृत पीकर सो जाएँगे।”
यह बात मज़ाक थी… पर बरसाने की स्वामिनी मज़ाक और पुकार में भेद नहीं करतीं।
3. भूखे मेहमान और मंदिर का कोना
दोनों साधु बरसाना पहुँचे। श्रीजी के दर्शन किए। आरती हो चुकी थी, मंदिर सूना था। उन्होंने किसी से कुछ नहीं माँगा। बस एक कोने में गुदड़ी बिछाई और मन ही मन बोले— “देखते हैं… मेहमाननवाज़ी कैसी होती है।” भूखे पेट आँखें मूँद लीं।
4. आधी रात और लाडली की डाँट
रात के ग्यारह बजे। मंदिर के पुजारी गहरी नींद में थे। अचानक किसी ने झकझोर दिया। एक कोमल, पर अधिकार भरी आवाज़— “अरे! तू यहाँ आराम से सो रहा है और मेरे मेहमान मंदिर की सीढ़ियों पर भूखे पड़े हैं?”
पुजारी काँप उठा। फिर वही आवाज़— “जा! मेरे मेहमानों को भोजन करा। अभी!”
यह आदेश था… वृषभानु-नंदिनी का।
5. छप्पन भोग और आँसू
पुजारी नंगे पाँव दौड़े। देखा—दो साधु सिकुड़े हुए सो रहे हैं। हाथ जोड़कर पूछा— “क्या आप ही… राधारानी के मेहमान हैं?”
साधु सन्न रह गए।
पुजारी बोला— “मना मत कीजिए। लाडली जी ने भेजा है।”
उस रात मंदिर में छप्पन भोग उतर आया। गरम पूड़ियाँ, कचौड़ी, खीर, मालपुए, लड्डू, रसगुल्ले… साधु खाते रहे और आँसू बहते रहे।
6. वह सपना जो सत्य बन गया
तृप्त होकर दोनों सो गए। स्वप्न में एक 10–12 वर्ष की बालिका आई। तेज सूर्य सा, शीतल चंद्रमा सी।
बोली— “बाबा… भोजन ठीक से हुआ?”
“हाँ लाली… बहुत आनंद आया।”
फिर सकुचाकर बोली— “पुजारी घबरा गया था। मेरा पान देना भूल गया। मेहमाननवाज़ी अधूरी रह गई।” और पान रख दिया।
7. जब सपना जाग गया
भोर हुई। दोनों की नींद टूटी। और… सिरहाने सचमुच दो पान पड़े थे। सुगंध से पूरा मंदिर महक उठा। अब रोना फूट पड़ा।
“हे राधे! हमने तो हँसी की थी… और तूने प्रेम से स्वीकार कर लिया।” 🌺
व्याख्या (Explanation)
राधारानी शब्द नहीं, भाव सुनती हैं।
यहाँ मज़ाक भी यदि प्रेम से निकले तो पुकार बन जाता है।
ब्रज में भक्त भूखा नहीं सो सकता।
🌼 कथा की सीख (Moral)
🌸 1. भगवान तर्क नहीं, तड़प सुनते हैं।
🌸 2. प्रेम में कही बात भी पुकार बन जाती है।
🌸 3. जहाँ भाव है, वहाँ व्यवस्था स्वयं बन जाती है।
🌸 4. ब्रज में मेहमान नहीं, परिवार होता है।
🌸 5. राधारानी अपने भक्त की छोटी-सी आस भी अधूरी नहीं रहने देतीं।
🌸 ।। जय जय श्री राधे ।। 🌸