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अहं का क्षय और भक्ति की कसौटी
(राजा मोरध्वज की कथा और अर्जुन का बोध)
महाभारत का महायुद्ध समाप्त हो चुका था। अधर्म पर धर्म की विजय हुई थी और पांडवों की विजय-पताका समूचे आर्यावर्त में लहरा रही थी। इस ऐतिहासिक विजय के पीछे जहाँ पांडवों का पुरुषार्थ था, वहीं श्रीकृष्ण का निरंतर सानिध्य और मार्गदर्शन भी था।
किन्तु विजय के साथ-साथ अर्जुन के मन में एक अत्यंत सूक्ष्म अहंकार ने जन्म ले लिया था। वह सोचने लगे—
“मेरे रथ के सारथी स्वयं त्रिभुवन के स्वामी हैं। वे हर क्षण मेरी रक्षा करते हैं, मेरी प्रत्येक बात मानते हैं। निश्चय ही मैं ही उनका सबसे प्रिय भक्त हूँ।”
लीलाधर श्रीकृष्ण अंतर्यामी हैं। वे भक्त के मन में उठने वाली सबसे हल्की तरंग को भी भाँप लेते हैं। उन्होंने जान लिया कि अर्जुन के भीतर यह अहंकार यदि समय रहते न टूटा, तो उसकी भक्ति का मार्ग अवरुद्ध हो सकता है। अतः सखा के कल्याण हेतु उन्होंने एक दिव्य लीला की योजना बनाई।
एक दिन श्रीकृष्ण ने सहज भाव से कहा—
“पार्थ! आज चलो, कहीं भ्रमण के लिए चलते हैं।”
दोनों ने साधुओं का वेश धारण किया। श्रीकृष्ण ने अपनी माया से एक भयावह सिंह को वश में कर अपने साथ ले लिया। अर्जुन यह देखकर विस्मित थे—वे समझ नहीं पा रहे थे कि माधव का उद्देश्य क्या है।
चलते-चलते वे उस प्रसिद्ध नगरी रत्नपुरी पहुँचे, जहाँ भगवान विष्णु के परम भक्त राजा मोरध्वज राज्य करते थे। उनकी दानवीरता, धर्मनिष्ठा और अतिथि-सत्कार की कीर्ति तीनों लोकों में विख्यात थी। कोई भी याचक उनके द्वार से निराश नहीं लौटता था।
राजा ने साधुओं को देखते ही सिंहासन त्याग दिया। चरण धोए, आदरपूर्वक आसन दिया और भोजन का आग्रह किया।
तब जोगी-वेषधारी श्रीकृष्ण बोले—
“राजन! हमने आपकी दानवीरता की बहुत कीर्ति सुनी है। आज हम आपके दान की परीक्षा लेना चाहते हैं।”
राजा मोरध्वज ने बिना क्षण भर रुके उत्तर दिया—
“नाथ! यह शरीर, यह राज्य और यह प्राण—सब प्रभु की ही देन हैं। आज्ञा दीजिए, जो चाहें स्वीकार करें।”
यह सुनकर अर्जुन के मन में गर्व की एक लहर उठी—
“भला ऐसा कौन-सा दान होगा, जो यह राजा न दे सके?”
तभी श्रीकृष्ण ने उस सिंह की ओर संकेत कर गंभीर स्वर में कहा—
“राजन! यह सिंह भूखा है और केवल मनुष्य के मांस से ही तृप्त होगा।”
सभा में सन्नाटा छा गया। रानी मूर्छित हो गईं। मंत्री और प्रजा भयभीत हो उठे। स्वयं अर्जुन का हृदय काँप गया—
“यह कैसी कठोर परीक्षा है!”
किन्तु राजा मोरध्वज तनिक भी विचलित नहीं हुए। शांत भाव से बोले—
“यदि इससे साधुओं का प्रयोजन सिद्ध होता है, तो यह मेरा सौभाग्य है। बताइए, किसका मांस चाहिए?”
श्रीकृष्ण का उत्तर था—
“तुम्हारा।”
करुण क्रंदन गूँज उठा। पर राजा निर्विकार रहे। उन्होंने अपने पुत्र ताम्रध्वज की ओर देखा। पुत्र ने पिता के चरणों में सिर रखकर कहा—
“पिताजी! यदि पिता का शरीर दान करना धर्म है, तो उसे अर्पित करने का अधिकार पुत्र को ही है।”
राजा ने प्रसन्न होकर पुत्र को आशीर्वाद दिया और स्वयं भूमि पर लेट गए। जैसे ही ताम्रध्वज ने खड्ग उठाया—
उसी क्षण सिंह अंतर्धान हो गया। साधुओं का वेश विलीन हो गया। पूरा राजमहल दिव्य प्रकाश से भर उठा।
सामने चतुर्भुज श्रीकृष्ण अपने विराट स्वरूप में प्रकट हुए और उनके साथ धनुर्धारी अर्जुन खड़े थे।
राजा और पुत्र दोनों भूमि पर गिर पड़े।
श्रीकृष्ण ने स्नेहपूर्वक कहा—
“राजन! तुम साक्षात धर्मस्वरूप हो। तुमने सिद्ध कर दिया कि सच्चा दान दिखावे से नहीं, त्याग से होता है। जहाँ ‘मैं’ नहीं रहता, वहीं मैं स्वयं प्रकट होता हूँ।”
फिर उन्होंने अर्जुन की ओर देखा।
अर्जुन की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। उनका सिर लज्जा से झुका हुआ था। वे समझ चुके थे कि भक्ति का मार्ग विजय या निकटता से नहीं, विनम्रता से तय होता है।
अर्जुन बोले—
“प्रभो! आज मेरा भ्रम टूट गया। मैं स्वयं को आपका प्रियतम मान बैठा था, पर सच्ची भक्ति तो वहाँ है जहाँ अहंकार का नाम भी नहीं।”
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उठाकर हृदय से लगा लिया और कहा—
“पार्थ! जो अपने को कुछ नहीं मानता, वही मुझे सबसे अधिक प्रिय होता है।”
उस दिन अर्जुन एक विजेता योद्धा नहीं, बल्कि एक विनम्र भक्त बनकर रत्नपुरी से लौटे।
कथा का भावार्थ (Explanation)
यह कथा बताती है कि भगवान अपने भक्तों की परीक्षा दंड देने के लिए नहीं, बल्कि उनका कल्याण करने के लिए लेते हैं। अर्जुन का अहं सूक्ष्म था, पर भक्ति के मार्ग में वही सबसे बड़ा अवरोध बन सकता था।
राजा मोरध्वज और ताम्रध्वज ने यह सिद्ध किया कि भक्ति और दान का शिखर स्वयं के सर्वस्व-त्याग में है, न कि प्रसिद्धि या दिखावे में।
कथा की शिक्षा / Moral
✨ जहाँ ‘मैं’ समाप्त होता है, वहीं ‘वह’ प्रकट होते हैं।