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🌸 भाव की पोशाक
बरसाने के एक संत की अमर कथा 🌸
बरसाना—जहाँ की मिट्टी में भी राधा का नाम रचा-बसा है। उसी पावन धरा पर एक वृद्ध संत रहा करते थे। सरल जीवन, कठोर नियम और अपार भक्ति—यही उनकी पहचान थी।
प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में उठना, यमुना जी में स्नान करना और बिना कुछ ग्रहण किए सीधे श्रीराधा रानी के दर्शन को जाना—यह उनका अटूट व्रत था। वर्षों बीतते गए। दर्शन करते-करते उनकी आयु अस्सी के पार पहुँच गई, पर नियम में तनिक भी शिथिलता न आई।
एक दिन दर्शन करते समय उनके मन में एक कोमल-सा भाव उठा—“इतने वर्षों से मैं किशोरी जी के दर्शन कर रहा हूँ, पर आज तक उनके चरणों में कुछ अर्पित नहीं कर पाया। कोई चुनरी लाता है, कोई चूड़ियाँ, कोई साड़ी… और मैं? मैंने क्या दिया?”
यह विचार उनके हृदय में ठहर गया। उसी रात वे सो न सके। अंततः निर्णय हुआ—
“मैं अपनी राधा रानी के लिए कुछ ऐसा लाऊँगा, जो केवल वस्तु न हो, भाव हो।”
अगली सुबह उन्होंने बाज़ार से सबसे सुंदर कपड़ा लिया। कुटिया लौटकर अपने ही हाथों से लहंगा-चुनरी सिलने लगे। हर टांका मानो प्रेम का मंत्र बन गया। गोटा लगाते समय उनके नेत्र भीग उठे—“मेरी लाड़ली इसे पहनेंगी तो कितनी सुंदर लगेंगी!”
जब पोशाक तैयार हुई, वे उसे लेकर मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। मन में उल्लास था। तभी बरसाने की एक छोटी-सी बालिका—लाली—मुस्कुराती हुई आई।
“बाबा, आज आप बहुत खुश लग रहे हैं!”
संत ने प्रेम से सब बता दिया। लाली ने पोशाक देखने की जिद की। देखते ही बोली—
“बाबा, राधा रानी के पास तो बहुत कपड़े हैं। यह मुझे दे दो ना!”
संत ने समझाया—
“बेटी, मैं तुम्हें बाज़ार से और दिला दूँगा। यह तो मैंने किशोरी जी के लिए बनाया है।”
पर बालिका कहाँ मानने वाली थी! देखते-देखते वह पोशाक छीनकर भाग गई।
संत वहीं सीढ़ियों पर बैठ गए। आँखों से अश्रु बहने लगे—
“आज पहली बार कुछ अर्पित करने चला था, और वही भी नहीं पहुँचा…”
अन्य संत आए, उन्होंने ढाढ़स बँधाया—
“बाबा, कल फिर बना लेना। चलो, आज दर्शन कर लो।”
मन भारी था, फिर भी वे दर्शन के लिए गए। मंदिर के पट खुले। घंटियों की ध्वनि जैसे बाबा के हृदय की धड़कनों से तालमेल बिठाने लगी। दीपों की लौ काँप रही थी, मानो वह भी किसी अलौकिक रहस्य की साक्षी बनने जा रही हो। फूलों की सुगंध वातावरण में तैर रही थी, पर बाबा का मन अब भी भारी था। वे अनमने भाव से हाथ जोड़कर खड़े थे।
तभी किसी संत ने विस्मय से कहा—
“बाबा… आज तो हमारी लाड़ली कुछ अलग ही रूप में विराजमान हैं।”
बाबा ने धीरे-धीरे अपना सिर उठाया।
जैसे ही उनकी दृष्टि श्रीराधा रानी के श्रीविग्रह पर पड़ी—समय थम गया।
वही लहंगा…
वही चुनरी…
वही रंग, वही गोटा, वही सिलाई…
वही पोशाक, जो उन्होंने अपने काँपते हाथों से, अपने जीवन की सारी भक्ति और प्रेम को टाँकों में पिरोकर बनाई थी।
बाबा का हृदय भर आया। आँखों से आँसू बहने लगे। उनके पैर काँप गए और वे वहीं मंदिर की भूमि पर बैठ गए।
कंठ अवरुद्ध था, फिर भी भावों का सैलाब शब्द बनकर फूट पड़ा—
“हे मेरी किशोरी जी…
आपको इतना भी धैर्य नहीं हुआ?
मैं तो आपको भेंट देने आया था,
और आप तो स्वयं मेरे प्रेम को सीढ़ियों से ही उठाकर ले गईं…”
उसी क्षण बाबा के अंतर्मन में एक दिव्य, स्नेह से भरी वाणी गूँज उठी—
न वह कानों से सुनी गई, न शब्दों में बँधी थी—
वह सीधे आत्मा में उतरी—
“बाबा…
यह केवल लहंगा-चुनरी नहीं थी।
इसमें आपके अस्सी वर्षों की प्रतीक्षा थी,
हर सुबह का संयम था,
हर दिन का नियम था
और वह निष्काम प्रेम था—
जिसमें कुछ पाने की चाह नहीं थी, केवल मुझे देने की तड़प थी।
आपका भाव इतना पवित्र था
कि मैं प्रतीक्षा नहीं कर सकी।
मैंने वस्त्र नहीं छीने, बाबा…
मैंने तो आपके प्रेम को स्वीकार किया है।”
यह सुनते ही बाबा फूट-फूट कर रो पड़े।
उनके आँसू अब दुःख के नहीं थे—
वे उस आनंद के थे,
जो जीवन भर की साधना के बाद मिलता है।
उन्होंने भूमि पर साष्टांग प्रणाम किया और काँपती आवाज़ में कहा—
“हे लाड़ली…
आज मेरा जीवन सफल हो गया।
आज मुझे समझ आया कि
मैंने आपको कुछ नहीं दिया—
आपने मुझे सब कुछ दे दिया।”
उस क्षण बरसाने की वह सीढ़ियाँ,
मंदिर की वह चौखट
और वह मौन वातावरण—
सब साक्षी बन गए इस सत्य के कि
जहाँ भाव सच्चा होता है, वहाँ भगवान स्वयं भक्त का अर्पण स्वीकार करने आते हैं।
✨ कथा का भावार्थ (Explanation
यह कथा बताती है कि भक्ति का मूल्य बाहरी दिखावे से नहीं, भीतर के समर्पण से तय होता है। संत का अर्पण साधारण वस्त्र था, पर उसमें वर्षों की निष्ठा, त्याग और प्रेम बुना था। राधा रानी का बालिका रूप में आकर उसे स्वीकार करना यह दर्शाता है कि ईश्वर भक्त के भाव को स्वयं ग्रहण करते हैं।
🌼 नीति / संदेश (Moral)
🌼 हार्ट-हिटिंग निष्कर्ष (One-Line Ending)
🌼“ईश्वर को चढ़ावे की नहीं, चढ़ते हुए हृदय की आवश्यकता होती है।”
🙏🌸 जय श्री राधे राधे कृष्ण 🌸🙏