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शनिदेव की माया और युधिष्ठिर की दिव्य बुद्धि
(कलियुग का पूर्व संकेत देने वाली पौराणिक कथा)
पाण्डवों का अज्ञातवास समाप्त होने में अभी कुछ समय शेष था। अज्ञातवास की शर्त के कारण पाँचों पाण्डव और माता द्रौपदी घने जंगलों में छिपते-छिपाते विचरण कर रहे थे। वे ऐसा सुरक्षित स्थान खोज रहे थे जहाँ कुछ समय विश्राम किया जा सके।
उसी समय आकाश-मंडल से न्याय के देवता शनिदेव की दृष्टि पाण्डवों पर पड़ी। उन्होंने मन ही मन विचार किया—
“इन पाँचों में सबसे अधिक बुद्धिमान कौन है? क्यों न इनकी परीक्षा ली जाए।”
यह सोचकर शनिदेव ने अपनी माया से जंगल के मध्य एक अद्भुत महल की रचना कर दी। उस महल के चार कोने थे—पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण। महल रहस्यों से भरा था।
भीम की परीक्षा (पूर्व दिशा)
सबसे पहले भीम की दृष्टि उस दिव्य महल पर पड़ी। वे आकर्षित हो उठे और युधिष्ठिर से अनुमति लेकर महल की ओर चल पड़े।
महल के द्वार पर एक दरबान खड़ा था—वास्तव में वही शनिदेव थे।
दरबान ने शर्तें रखीं—
भीम ने शर्त स्वीकार की और पूर्व दिशा में गए।
वहाँ उन्होंने अद्भुत दृश्य देखा—
अनोखे पशु-पक्षी, फल-फूलों से लदे वृक्ष और आगे तीन कुएँ।
दो छोटे कुएँ और बीच में एक बड़ा कुआँ।
उन्होंने देखा—
बड़े कुएँ में उफान आता और वह दोनों छोटे कुओं को भर देता।
लेकिन जब छोटे कुओं में उफान आता, तब वे बड़े कुएँ को पूरा नहीं भर पाते।
भीम यह रहस्य समझ नहीं पाए और लौट आए। व्याख्या न कर पाने के कारण उन्हें बंदी बना लिया गया।
अर्जुन की परीक्षा (पश्चिम दिशा)
इसके बाद अर्जुन गए। उन्होंने पश्चिम दिशा में देखा—
एक खेत में दो फसलें उग रही थीं—
एक ओर बाजरा, दूसरी ओर मक्का।
पर आश्चर्य यह था कि—
बाजरे के पौधे से मक्का निकल रहा था
और मक्का के पौधे से बाजरा।
अर्जुन भी इसका अर्थ नहीं समझ पाए और वे भी बंदी बना लिए गए।
नकुल की परीक्षा (उत्तर दिशा)
नकुल उत्तर दिशा में गए। वहाँ उन्होंने देखा—
अनेक सफेद गायें, जो भूख लगने पर अपनी ही बछियों का दूध पी रही थीं।
यह दृश्य अत्यंत विचित्र था। नकुल भी इसका अर्थ न समझ सके और बंदी बना लिए गए।
सहदेव की परीक्षा (दक्षिण दिशा)
अंत में सहदेव दक्षिण दिशा में गए।
वहाँ उन्होंने देखा—
एक विशाल सोने की शिला, जो केवल एक चाँदी के सिक्के पर टिकी हुई थी।
वह डगमगाती थी, पर गिरती नहीं थी।
सहदेव भी इसका रहस्य न समझ पाए और वे भी बंदी बना लिए गए।
युधिष्ठिर का आगमन और समाधान
जब चारों भाई बहुत देर तक नहीं लौटे, तब युधिष्ठिर माता और द्रौपदी के साथ स्वयं महल पहुँचे।
उन्होंने एक-एक करके भाइयों से पूछा—
भीम के कुओं का अर्थ
युधिष्ठिर बोले—
“यह कलियुग का संकेत है।
एक पिता दो बेटों का पालन कर देगा,
पर दो बेटे मिलकर भी एक पिता का पालन नहीं कर पाएँगे।”
भीम मुक्त हुए।
अर्जुन की फसलों का अर्थ
युधिष्ठिर ने कहा—
“यह कलियुग में वंश और संस्कारों के परिवर्तन का संकेत है—
जहाँ वर्ण, संस्कार और मर्यादाएँ गड़बड़ा जाएँगी।”
अर्जुन भी मुक्त हुए।
नकुल की गायों का अर्थ
युधिष्ठिर बोले—
“कलियुग में माताएँ बेटों के बजाय बेटियों पर आश्रित होंगी,
और बेटे अपने कर्तव्य से विमुख हो जाएँगे।”
नकुल भी छूट गए।
सहदेव की सोने की शिला का अर्थ
अंत में युधिष्ठिर ने कहा—
“कलियुग में पाप धर्म को दबाने का प्रयास करेगा,
परन्तु धर्म पूरी तरह नष्ट नहीं होगा।
वह डगमगाएगा, पर गिरेगा नहीं।”
सहदेव भी मुक्त हुए।
शनिदेव का स्वीकार और कथा का सार
तब शनिदेव ने प्रकट होकर स्वीकार किया—
“युधिष्ठिर ही सबसे बुद्धिमान हैं।
उन्होंने समय से पहले कलियुग के सत्य को समझ लिया।”
कथा का संदेश (Explanation)
यह कथा हमें सिखाती है कि—
सच्ची बुद्धि केवल बल या शस्त्र में नहीं, बल्कि विवेक और धर्मबोध में होती है।
कलियुग में मूल्य गिरेंगे, रिश्ते बदलेंगे, धर्म डगमगाएगा—
लेकिन धर्म समाप्त नहीं होगा।
जो सत्य और विवेक से जुड़ा रहेगा, वही अंततः विजयी होगा।
✨ यह कथा आज के समाज का दर्पण है और युधिष्ठिर की दूरदर्शिता का अमर प्रमाण।