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🌸 कर्म का ऋण: जो चुकाए बिना मिटता नहीं🌸

जब समय भी न्याय का सेवक बन जाता है

 

महाभारत का महायुद्ध समाप्त हो चुका था। कुरुक्षेत्र की रणभूमि अब शंखनाद और रथों की गर्जना से नहीं, बल्कि विलाप, सिसकियों और विधवाओं के क्रंदन से गूंज रही थी।

हस्तिनापुर का सिंहासन तो बच गया था, पर वह सिंहासन अब सूना था—उस पर बैठने वाला कोई उत्तराधिकारी शेष नहीं था।

 

हस्तिनापुर के वृद्ध महाराज धृतराष्ट्र, जो जन्म से नेत्रहीन थे, आज जीवन से भी अंधेरे में डूब चुके थे। सौ पुत्र… एक नहीं, दो नहीं, पूरे सौ—काल के मुख में समा चुके थे।

जिस पिता ने कभी अपने पुत्रों की संख्या पर गर्व किया था, वही आज श्मशान-सी नीरवता में घिरा था।

 

पुत्र-शोक से व्याकुल होकर धृतराष्ट्र ने भगवान श्रीकृष्ण को पुकारा। उनका स्वर कांप रहा था—

“हे केशव! यदि आप ही न्याय के अधिष्ठाता हैं, तो यह कैसा न्याय है?

मैंने इस जीवन में किसी का अहित नहीं किया, फिर मेरे सौ पुत्र क्यों मारे गए?

मैंने प्रकाश कभी देखा ही नहीं, क्या इतना अंधकार ही मेरा भाग्य था?”

 

श्रीकृष्ण, जो सदा मुस्कान बिखेरते हैं, आज गंभीर थे। उन्होंने धृतराष्ट्र के कंधे पर हाथ रखा और कहा—

“महाराज, मनुष्य केवल इस जन्म को देखता है,

पर कर्म का लेखा जन्मों-जन्मों तक चलता है।

यदि उत्तर चाहते हो, तो तुम्हें पचास जन्म पीछे जाना होगा।”

श्रीकृष्ण ने उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान की।

 

🔱 पचास जन्म पूर्व की कथा

समय की परतें खुलीं।

धृतराष्ट्र ने स्वयं को एक भिन्न रूप में देखा—एक अत्यंत शक्तिशाली, किंतु क्रूर राजा के रूप में।

 

एक दिन एक तपस्वी ब्राह्मण उनके दरबार में आया। वह तीर्थयात्रा पर जा रहा था। उसके पास एक हंस और हंसिनी का जोड़ा था, जो उसे प्राणों से भी प्रिय थे।

उसने विनम्र होकर कहा—

“राजन, मेरी अनुपस्थिति में कृपया इनका संरक्षण करें।”

राजा ने वचन दिया।

 

कुछ समय पश्चात हंसिनी ने सौ अंडे दिए—अद्भुत, उज्ज्वल और जीवन से भरे हुए।

राजा ने जब उन्हें देखा, तो उसका लोभ जाग उठा।

वचन, करुणा और धर्म—सब जीभ के स्वाद के आगे हार गए।

 

राजा ने आदेश दिया—

“इन अंडों को पकाया जाए।”

एक-एक कर सौ अंडे नष्ट कर दिए गए।

जब समय बीता और उन अंडों से कोई शावक नहीं निकला, तो हंस और हंसिनी व्याकुल हो उठे।

अपनी अजन्मी संतानों के विनाश से टूटे हुए, वे न रो सके, न बोल सके—बस मौन पीड़ा में डूब गए।

उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया और राजा के सामने ही तड़प-तड़प कर प्राण त्याग दिए।

 

श्रीकृष्ण की वाणी गूंज उठी—

“राजन, उन अंडों में पल रहे जीवों ने प्रकाश नहीं देखा था।

इसलिए इस जन्म में तुम भी नेत्रहीन हुए।

सौ अंडों के विनाश का फल—सौ पुत्रों का शोक।”

 

🕉️ दार्शनिक व्याख्या (Explanation)

धृतराष्ट्र ने कांपते स्वर में पूछा—

“हे केशव! यदि पाप पचास जन्म पहले किया, तो दंड अब क्यों?”

 

श्रीकृष्ण ने कर्म-सिद्धांत का रहस्य खोला—

  • सौ पुत्रों को प्राप्त करना कोई सामान्य पुण्य नहीं
  • उसके लिए अत्यंत विशाल पुण्य-भंडार चाहिए
  • पचास जन्मों तक धृतराष्ट्र ने छोटे-छोटे पुण्य संचित किए
  • जब पुण्य अपने शिखर पर पहुँचा, तभी उन्हें सौ पुत्र मिले
  • और जैसे ही पुण्य क्षीण हुआ, पुराना पाप जाग उठा

“शोक के लिए पहले सुख आवश्यक है।

कर्म अवसर की प्रतीक्षा करता है, विस्मृति की नहीं।”

 

🌼 नीति / Moral of the Story

  1. कर्म कभी समाप्त नहीं होता
    वह समय के गर्भ में छिपा रहता है और उचित अवसर पर फल देता है।
  2. विश्वासघात सबसे बड़ा अधर्म है
    विशेषकर जब वह निर्बल और मौन प्राणियों के साथ किया जाए।
  3. सुख भी कर्म का फल है, दुःख भी
    वर्तमान सुख पुराने पुण्य का परिणाम है,
    और वर्तमान दुःख पुराने ऋण का भुगतान।
  4. ईश्वर दंड नहीं देते, केवल न्याय करते हैं
    और वह न्याय समय के साथ पूर्ण होता है।

🙏 जय श्रीकृष्ण!

🌸 यह कथा हमें सावधान करती है—जो आज बोया जाएगा, वही कभी न कभी काटना ही पड़ेगा। 🌸