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जहाँ व्याकरण हार गया और भक्ति जीत गई

— गुरुवायुर के श्रीकृष्ण और भक्त पून्थानम की अमर कथा

 

दक्षिण भारत के केरल प्रांत में स्थित गुरुवायुर मंदिर—जहाँ बाल-रूप में विराजमान श्रीकृष्ण को गुरुवायुरप्पन कहा जाता है—भक्ति, करुणा और लीलाओं का अद्भुत संगम है।

इसी पावन धाम से जुड़ी है एक ऐसी कथा, जो बताती है कि भगवान को शब्दों की शुद्धता नहीं, हृदय की सच्चाई प्रिय है।

 

🌼 भक्त पून्थानम और नन्हा कृष्ण

संत पून्थानम मलयालम भाषा के महान भक्त-कवि थे। वे विद्वान नहीं थे, न ही संस्कृत के ज्ञाता—पर उनका हृदय बालकृष्ण की सरल भक्ति से भरा था।

वे जो भी लिखते, उसमें न अलंकार होता, न व्याकरण का प्रदर्शन—बस अपने प्रिय कृष्ण के प्रति निश्छल प्रेम।

 

1️⃣ ज्ञान और भक्ति का टकराव

उसी समय गुरुवायुर में रहते थे मेलपथुर भट्टाथिरी—संस्कृत के प्रकांड विद्वान, महान कवि और नारायणीयम जैसे दिव्य ग्रंथ के रचयिता।

उनके ज्ञान का यश दूर-दूर तक फैला था, और उसी के साथ उनके भीतर अहंकार भी।

 

एक दिन पून्थानम अपनी एक रचना “ज्ञानप्पणा” लेकर भट्टाथिरी के पास पहुँचे। उन्होंने विनम्रता से कहा—

“मैं साधारण भक्त हूँ, कृपया इसे देख कर सुधार दीजिए।”

भट्टाथिरी ने रचना देखी और उपहास करते हुए बोले—

“तुम्हें संस्कृत का व्याकरण तक नहीं आता!

ऐसे शब्दों से भगवान की स्तुति?

जाओ, पहले पढ़ना सीखो!”

अपमानित होकर पून्थानम वहाँ से चले गए।

उनकी आँखों से आँसू बह निकले, पर हृदय में कोई कटुता नहीं थी—बस अपने कृष्ण का स्मरण।

 

2️⃣ भगवान की घोषणा

पून्थानम मंदिर के एक कोने में बैठकर रोने लगे—

“हे गुरुवायुरप्पा! मुझसे कुछ न हुआ… पर मेरा प्रेम तो सच्चा है।”

तभी गर्भगृह से एक दिव्य वाणी गूँजी

(कुछ कथाओं में कहा गया है कि एक छोटा बालक आकर बोला):

“भट्टाथिरी!

मुझे तुम्हारी संस्कृत की शुद्धता से अधिक

पून्थानम की भक्ति और उसकी भाषा की सरलता प्रिय है।

व्याकरण से अधिक भाव महत्वपूर्ण है।”

 

यह सुनते ही भट्टाथिरी स्तब्ध रह गए।

उनका अहंकार चूर-चूर हो गया।

वे दौड़कर पून्थानम के पास आए, उनके चरणों में गिर पड़े और क्षमा माँगी।

 

उस दिन से भट्टाथिरी ने समझ लिया—

ज्ञान तब तक अधूरा है, जब तक उसमें विनम्रता न हो।

 

3️⃣ जब स्वयं कृष्ण बने रक्षक

एक बार पून्थानम किसी कार्य से जंगल के रास्ते जा रहे थे।

अचानक कुछ डाकुओं ने उन्हें घेर लिया।

न उनके पास धन था, न हथियार।

 

पून्थानम ने आँखें बंद कर लीं और पुकारा—

“हे गुरुवायुरप्पन!

अब तो बस आप ही सहारा हैं।”

 

क्षणभर में वहाँ एक तेजस्वी घुड़सवार प्रकट हुआ।

उसने अकेले ही डाकुओं को खदेड़ दिया।

 

पून्थानम ने कृतज्ञता से अपनी अंगूठी उतारकर उस घुड़सवार को दी।

वह मुस्कुराया और बिना कुछ कहे चला गया।

 

कुछ दिनों बाद जब पून्थानम गुरुवायुर मंदिर पहुँचे,

तो उनकी दृष्टि भगवान की मूर्ति पर पड़ी—

उसी अंगूठी से सजी हुई!

 

उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली।

वे समझ गए—

“मेरे कृष्ण स्वयं मेरी रक्षा करने आए थे।”

 

🌼 भावार्थ / व्याख्या (Explanation)

यह कथा सिखाती है कि—

  • भगवान को पांडित्य नहीं, प्रेम चाहिए
  • भाषा नहीं, भाव बोलता है
  • जो भक्त सरल होता है, भगवान स्वयं उसकी ढाल बन जाते हैं

पून्थानम का जीवन यह प्रमाण है कि

ईश्वर भक्त के साथ तर्क नहीं करते—वे उसके साथ चलते हैं।

 

🌺 नीति / Moral

🌿 ईश्वर के लिए दिखावा नहीं, सरल हृदय चाहिए।

🌿 ज्ञान अहंकार लाए तो बोझ है, भक्ति विनम्र बनाए तो वरदान।

🌿 जो भगवान पर पूर्ण भरोसा करता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।