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🌸 गोद का भोग

संत चोखामेला और विठ्ठल की अपूर्व लीला

 

🌿 1. गृहस्थ संत का जीवन

🕉️ काव्य

न गद्दी, न सिंहासन,

न वैराग्य का वेश।

गृह में रहकर हरि जपे,

वही संत विशेष।

📖 विवरणात्मक अनुच्छेद

महाराष्ट्र की पवित्र भूमि पर संत चोखामेला एक साधारण गृहस्थ के रूप में रहते थे। उनका जीवन किसी चमत्कार या बाह्य वैभव से युक्त नहीं था। वे ईंट-पत्थर के काम, गृह निर्माण जैसे कठिन श्रम से जो थोड़ा-बहुत धन मिलता, उसी से अपने परिवार का निर्वाह करते थे। आय सीमित थी, पर हृदय में अपार भक्ति थी। उनके पास कभी अधिक धन नहीं होता था, पर जो कुछ भी होता, वह सबसे पहले अपने ठाकुर जी की सेवा में अर्पित करने की भावना रखते थे।

 

🌿 2. बाज़ार और केले की प्रेरणा

🕉️ काव्य

बाज़ार में दिखे सुनहरे फल,

मन में जागी एक पुकार।

“विठ्ठल को यह भाएगा”,

बस यही था विचार।

📖 विवरणात्मक अनुच्छेद

एक दिन चोखामेला अपने घर के ठाकुर जी की सेवा के लिए सब्ज़ी लेने जा रहे थे। जेब में बहुत थोड़े से रुपये थे। बाज़ार पहुँचे तो उन्होंने देखा कि कहीं बहुत बड़े-बड़े, सुंदर केले सजे हुए हैं। उन्हें देखते ही उनके मन में विचार आया—“ये केले मेरे विठ्ठल भगवान को बहुत अच्छे लगेंगे।” वह प्रेरणा भीतर से आई थी, किसी गणना से नहीं। उन्होंने सब्ज़ी नहीं खरीदी और उन्हीं पैसों से केले ले लिए। उनके लिए यह कोई सौदा नहीं था, बल्कि प्रेम की सहज प्रतिक्रिया थी।

 

🌿 3. मंदिर का द्वार और अपमान

🕉️ काव्य

द्वार खड़ा भक्त पुकारे,

भीतर गूँजे तिरस्कार।

प्रेम समझा न गया जहाँ,

वही टूटा अभिमान।

📖 विवरणात्मक अनुच्छेद

चोखामेला जी को मंदिर के भीतर प्रवेश का अधिकार नहीं था। वे मंदिर के बाहर ही खड़े हुए और विनम्र स्वर में पुकार लगाई कि विठ्ठल भगवान को केले का भोग लगा दीजिए। परंतु भगवान के कुछ सेवकों ने उन्हें धक्का देकर बाहर कर दिया। कटु वचनों में कहा गया—“दो-चार बार नाम ले लेने से क्या तुम इतने बड़े भक्त बन गए कि तुम्हारे हाथ का छुआ हुआ भोग भगवान स्वीकार कर लेंगे?” यह अपमान गहरा था, पर चोखामेला के मन में कोई क्रोध नहीं उठा।

 

🌿 4. प्रभु से प्रश्न और आत्मसंघर्ष

🕉️ काव्य

अपमान का दुख नहीं था,

प्रश्न था बस एक यही—

“प्रेरणा तुमने दी प्रभु,

फिर अस्वीकार क्यों की?”

📖 विवरणात्मक अनुच्छेद

चोखामेला एकांत में चले गए और सीधे प्रभु से संवाद करने लगे। उन्होंने कहा—“मेरा अपमान हुआ, इसका मुझे कोई दुख नहीं। पर आपने ऐसा क्यों किया? मेरे हृदय में आपने ही प्रेरणा दी कि आप केले खाना चाहते हैं। फिर मुझे ऐसी जगह क्यों पैदा किया, जहाँ मेरी सेवा आपको स्वीकार नहीं? यदि मेरा यह शरीर आपकी सेवा के योग्य नहीं है, तो मैं इसे रखकर क्या करूँ?” यह कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि पूर्ण समर्पण से निकला हुआ प्रश्न था।

 

🌿 5. कठोर संकल्प

🕉️ काव्य

अन्न भी छोड़ा, जल भी छोड़ा,

देह को ही प्रश्न बनाया।

“जब तक उत्तर न मिलेगा,

यह शरीर न निभाया।”

📖 विवरणात्मक अनुच्छेद

उस क्षण चोखामेला ने अत्यंत कठोर संकल्प लिया। उन्होंने अपनी कुटिया का दरवाज़ा बंद कर लिया और निश्चय किया कि अब न अन्न ग्रहण करेंगे, न जल। उन्होंने ठान लिया कि यदि यह शरीर प्रभु की सेवा के योग्य नहीं है, तो वे इसे त्याग देंगे। यह त्याग हठ नहीं था, बल्कि प्रेम की चरम अवस्था थी।

 

🌿 6. रात्रि में स्वयं विठ्ठल का आगमन

🕉️ काव्य

शयन में गए जब नाथ,

उठ आए भक्त पुकार।

द्वार खटखटाया प्रेम ने,

बनकर नवकुमार।

📖 विवरणात्मक अनुच्छेद

जैसे ही मंदिर में ठाकुर जी को शयन कराया गया, उसी क्षण वे मंदिर से बाहर आए। नवकिशोर रूप में वे सीधे चोखामेला की कुटिया के बाहर पहुँचे और दरवाज़ा खटखटाया। अमृतमयी वाणी में पुकारा। चोखामेला ने भीतर से पूछा—“कौन है?” उत्तर मिला—“चोखामेला, मुझे बहुत भूख लगी है।”

 

🌿 7. गोद का भोग

🕉️ काव्य

आसन छोड़ा, गोद चुनी,

प्रेम ने मर्यादा तोड़ी।

मंदिर छूटा, हृदय मिला,

भोग में आत्मा जोड़ी।

📖 विवरणात्मक अनुच्छेद

दरवाज़ा खुलते ही चोखामेला ने नवकिशोर ठाकुर जी को सामने देखा और भावविभोर होकर रो पड़े। प्रभु ने कहा—“रोने का समय नहीं है, मुझे बहुत भूख लगी है।” चोखामेला ने जैसा भी आसन था, वैसा बिछाने को कहा, पर प्रभु बोले—“नहीं, मैं तुम्हारी गोद में बैठकर खाऊँगा।” फिर वही केले मँगवाए। प्रभु उनकी गोद में बैठकर केले खाने लगे। उस क्षण चोखामेला के लिए सारा संसार विलीन हो गया।

 

🌿 8. प्रेम का रहस्य

🕉️ काव्य

जाति न देखी, कुल न देखा,

साधन भी न गिने।

“जो केवल मेरे लिए है,

वही मुझे मिले।”

📖 विवरणात्मक अनुच्छेद

प्रभु ने कहा—“आज जो स्वाद इन केलों में है, वह मंदिर में लगाए भोग में भी नहीं मिलता। मैं किसी जाति, कुल, साधना या तपस्या का नहीं होता। जो केवल मेरे लिए है, मैं उन्हीं का होता हूँ।” फिर उन्होंने रुक्मिणी जी के लिए भी केले मँगवाए और सब खाकर अंतर्ध्यान हो गए।

 

🌿 9. मंदिर का बंद द्वार और सत्य का उद्घाटन

🕉️ काव्य

छिलकों ने खोला राज़ सब,

बंद द्वार बना प्रमाण।

जिसको कल ठुकराया गया,

वही बना भगवान।

📖 विवरणात्मक अनुच्छेद

सुबह मंदिर का द्वार नहीं खुला। प्रभु ने आदेश दिया कि जब तक चोखामेला को पालकी में बैठाकर नहीं लाया जाएगा, द्वार नहीं खुलेगा। सेवक पालकी लेकर पहुँचे। कल जिसे धक्का दिया गया था, आज उसी के चरण पकड़े गए। मंदिर पहुँचते ही चोखामेला ने प्रभु से प्रार्थना की—“प्रभु, अब बस कीजिए।” और तत्काल द्वार खुल गए।

 

🌿 10. निष्कर्ष

🕉️ काव्य

छोटी सी सेवा, सच्चा भाव,

बन गया लीला का द्वार।

जो आठों पहर हरि में जिए,

उसका कैसा हो संसार?

📖 विवरणात्मक अनुच्छेद

चोखामेला जी की यह कथा बताती है कि प्रभु भोग नहीं, भाव देखते हैं। एक साधारण केले ने वह कर दिखाया, जो बड़े-बड़े यज्ञ नहीं कर पाए। यदि मनुष्य निरंतर प्रभु के लिए जिए, तो उसका जीवन स्वयं एक चमत्कार बन जाता है।