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🌿 सत्संग का चमत्कार 🌿

(सत्संग का एक वचन कैसे जीवन बदल देता है)

बहुत समय पहले की बात है। एक कुख्यात चोर अपनी अंतिम साँसें गिन रहा था। मृत्यु से पहले उसने अपने बेटे को पास बुलाया। कमजोर स्वर में, लेकिन अनुभव की कठोरता से भरे शब्दों में उसने कहा—

“बेटा, अगर कभी चोरी के रास्ते पर ही चलना पड़े तो याद रखना—गुरुद्वारे, धर्मशालाओं और धार्मिक स्थानों से हमेशा दूर रहना। वहाँ की हवा भी इंसान को बदल देती है। और दूसरी बात, अगर कभी पकड़े जाओ तो चाहे कितनी भी मार पड़े, अपना अपराध स्वीकार मत करना।”

बेटे ने सिर झुकाकर कहा—“सत्य वचन।”

इतना कहकर वह चोर संसार से विदा हो गया।

पिता की सीख को सीने से लगाए वह लड़का रोज़ रात चोरी करने निकलता। उसका जीवन अंधकार, डर और भागदौड़ से भरा था। एक रात वह एक बड़े घर में चोरी करने घुसा। ताले टूटे ही थे कि घरवालों की नींद खुल गई। शोर मच गया। बाहर पहरेदार पहले से मौजूद थे।

एक ओर घरवाले, दूसरी ओर पहरेदार—अब भागने का कोई रास्ता नहीं था। किसी तरह वह अंधेरे में जान बचाकर भागा। दौड़ते-दौड़ते उसके सामने एक धर्मशाला आ गई।

उसके कदम ठिठक गए।

उसे पिता की चेतावनी याद आ गई—“धर्मशाला में मत जाना।”

लेकिन अब करे तो क्या करे? जान बचाने के लिए वही उसका अंतिम सहारा था। वह चुपचाप धर्मशाला में घुस गया। भीतर सत्संग चल रहा था।

वह पिता की आज्ञा का पालन करना चाहता था, इसलिए उसने अपने कानों में उंगलियाँ डाल लीं कि सत्संग के वचन उसके भीतर न उतर जाएँ। पर मन को कौन बाँध सकता है?

कानों को बंद करने के बाद भी एक वाक्य उसके भीतर उतर गया—

देवी-देवताओं की परछाई नहीं होती।

वह सोचने लगा—परछाई हो या न हो, मुझे इससे क्या लेना-देना?

उसी समय किसी ने पहरेदारों को बता दिया कि चोर धर्मशाला में छिपा है। खोजबीन हुई और वह पकड़ा गया।

पुलिस ने खूब मारा, पर उसने अपराध स्वीकार नहीं किया। उस समय नियम था कि अपराध स्वीकार किए बिना सज़ा नहीं दी जा सकती। अंततः उसे राजा के सामने पेश किया गया। वहाँ भी मार पड़ी, लेकिन वह अडिग रहा।

पुलिस ने तब एक चाल चली। उन्होंने एक ठगिनी को बुलाया जो देवी का रूप धरने में माहिर थी। उसने देवी का वेश बनाया—दो नकली भुजाएँ, चार हाथों में मशालें, और शेर की सवारी। सब कुछ इतना सजीव था कि देखने वाला धोखा खा जाए।

अंधेरी कोठरी का दरवाज़ा अचानक खुला। प्रकाश फैल गया। चोर, जो भीतर देवी का स्मरण कर रहा था, चौंक गया।

देवी-रूपधारी ठगिनी ने गंभीर स्वर में कहा—

“भक्त! तूने मुझे याद किया और मैं आ गई। तूने अपराध स्वीकार नहीं किया, यह बहुत अच्छा किया। अब मुझसे सच-सच बता दे। मैं तुझे अभी मुक्त करा दूँगी।”

चोर का मन डगमगा गया। अपने इष्ट को सामने देखकर वह सच बताने ही वाला था कि अचानक उसकी नज़र देवी की परछाई पर पड़ गई।

क्षणभर में सत्संग का वही वचन उसके भीतर गूंज उठा—

देवी-देवताओं की परछाई नहीं होती।

उसका मन जाग उठा। वह समझ गया—यह देवी नहीं, एक छल है।

वह शांत स्वर में बोला—

“माँ! मैंने चोरी नहीं की। अगर मैंने की होती, तो क्या आपको पता न होता?”

बाहर बैठे पहरेदारों और स्वयं ठगिनी को भी यकीन हो गया कि यह व्यक्ति निर्दोष है। अगले दिन राजा को बताया गया कि यह चोर नहीं है। राजा ने उसे मुक्त कर दिया।

आजाद होकर वह देर तक सोचता रहा—

“सत्संग का सिर्फ एक वचन मेरी जान बचा गया। अगर मैं पूरी ज़िंदगी सत्संग में लगा दूँ, तो मेरा जीवन ही बदल जाएगा।”

उस दिन के बाद उसने चोरी का मार्ग छोड़ दिया। वह प्रतिदिन सत्संग में जाने लगा। धीरे-धीरे उसका हृदय शुद्ध हुआ और वह एक अच्छा इंसान, एक महात्मा बन गया।

 

यही है जीवन का सार।

कलयुग में सत्संग ही सबसे बड़ा तीर्थ है।

 

🙏 जय श्री राधे 🙏