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अंत का बहाना

(दुर्वासा की परीक्षा और जरा का बाण)

 

वन के भीतर समुद्र की ओर खुलता हुआ वह शांत स्थल किसी गूढ़ रहस्य का साक्षी बनने जा रहा था। श्रीकृष्ण अपने पिता को यदुवंश के विनाश का समाचार देकर लौट आए थे। द्वारिका अब स्मृति बन चुकी थी। दायित्व, राजनीति, युद्ध—सब पीछे छूट चुके थे। अब वे केवल अपने अग्रज बलराम के साथ कुछ अंतिम क्षण बिताना चाहते थे।

एक विशाल वृक्ष के नीचे बलराम निश्चेष्ट बैठे थे। वे ध्यान में थे या जीवन से परे जा चुके थे—यह स्पष्ट नहीं था। कृष्ण ने उनकी समाधि भंग करना उचित न समझा और पास ही बैठ गए। कुछ ही क्षण बीते होंगे कि बलराम के मस्तक के पीछे से एक दिव्य, विशाल नाग प्रकट हुआ। वह धीरे-धीरे सरकता हुआ समुद्र की ओर बढ़ा और लहरों में विलीन हो गया। तट पर नागराज वासुकी, कर्कोटक, शंख, अतिषंड तथा स्वयं वरुण देव उसके स्वागत में उपस्थित थे।

क्षण भर में बलराम का शरीर भूमि पर लुढ़क गया।

कृष्ण ने कुछ देर अपने बड़े भाई को निहारा। फिर वे स्वयं कुछ दूरी पर जाकर लेट गए। जीवन की यात्रा क्या अब उन्हें भी पूर्ण प्रतीत होने लगी थी? आकाश की ओर देखते हुए स्मृतियाँ उमड़ पड़ीं—

यशोदा की ममता,

यमुना के तट,

राधा संग रास,

कंस का वध,

द्वारिका का वैभव,

रुक्मिणी का प्रेम,

महाभारत का युद्ध

और अंततः—यादवों का विनाश।

इन्हीं विचारों के बीच उनके एक तलवे में तीव्र पीड़ा उठी। उन्होंने नेत्र खोले—एक बाण धंसा था।

तभी एक व्याध दौड़ता हुआ आया और कृष्ण के चरणों में गिर पड़ा। उनके रक्तरंजित गुलाबी चरणों को अपनी गोद में रखकर वह रोने लगा।

“क्षमा करें प्रभु! मैं मृग-शिकार पर था। चरणों की झलक दिखी, उन्हें हिरण समझ बैठा।”

कृष्ण ने शांत स्वर में पूछा,

“तुम्हारा नाम?”

“मेरा नाम जरा है।”

“तो मित्र जरा,” कृष्ण मुस्कराए, “शांत हो जाओ। तुमसे कोई अपराध नहीं हुआ।”

जब जरा को ज्ञात हुआ कि वे स्वयं कृष्ण हैं, तो उसका शोक और बढ़ गया।

“यदि आप ईश्वर हैं, तो मेरे बाण से आपको पीड़ा कैसे?”

कृष्ण गंभीर हो उठे।

“क्या कृष्ण मानव नहीं है? उसे भी घाव लगते हैं। पर यह घाव विशेष है—यह मेरी मृत्यु का कारण बनेगा।”

जरा स्तब्ध रह गया।

“मेरे बाण में ऐसी शक्ति कैसे?”

तभी कृष्ण ने वह घटना सुनानी आरंभ की, जो उनके अंत से जुड़ी थी—

 

दुर्वासा की परीक्षा

“बहुत पहले द्वारिका में एक साधु आए थे,” कृष्ण बोले।

“दुर्वासा—क्रोध के लिए कुख्यात। उन्होंने नगर में घोषणा की कि वे कुछ समय द्वारिका में रहना चाहते हैं, पर जो उनके स्वभाव को सहन कर सके, वही उन्हें आमंत्रित करे। कोई आगे नहीं आया।”

“तब मैंने उन्हें अपने घर बुलाया। मैं जानता था—यह परीक्षा है।”

दुर्वासा का स्वभाव विचित्र था। कभी वे दस लोगों का भोजन अकेले कर जाते, कभी एक ग्रास खाकर उठ जाते। कभी अचानक सो जाते, कभी आधी रात उठकर भोजन मांगते। एक क्षण में शयनकक्ष जला डालते, अगले ही क्षण उसी में सोने लौट आते। हर समय सतर्क रहना पड़ता—सेवा में कोई कमी न रह जाए।

“उन्होंने कई बार हमें परखने का प्रयास किया,” कृष्ण बोले,

“पर मैंने और रुक्मिणी ने धैर्य नहीं छोड़ा।”

एक दिन दुर्वासा ने अत्यंत स्वादिष्ट खीर बनवाई। उन्होंने उसमें उंगली डुबोई, थोड़ा सा चखा और कहा,

“इस खीर को अपने पूरे शरीर पर मल लो।”

कृष्ण ने बिना प्रश्न किए वैसा ही किया। दुर्वासा ने रुक्मिणी की ओर देखा। उनकी इच्छा समझकर कृष्ण ने रुक्मिणी को भी खीर का लेपन करा दिया।

इसके बाद दुर्वासा बाहर आए। उन्होंने एक रथ मंगवाया, घोड़ों को हटवाया और रुक्मिणी को ही रथ में जोत दिया। जैसे घोड़ों पर कोड़े बरसते हैं, वैसे ही रुक्मिणी की पीठ पर प्रहार होने लगे। द्वारिका की गलियों से वह रथ गुजरता रहा।

“हम सब उनके पीछे दौड़ रहे थे,” कृष्ण बोले,

“पर न मैंने विरोध किया, न रुक्मिणी ने आह भरी।”

अंततः दुर्वासा रुके। उन्होंने कहा,

“तुम्हारी परीक्षा पूर्ण हुई।”

उन्होंने रुक्मिणी को औषधि दी—क्षण भर में सभी घाव भर गए। फिर उन्होंने कृष्ण से कहा—

“तुमने जीवन भर अपने मन की की है—माखन चुराया, माता को सताया, असुरों का वध किया। संसार ने तुम्हारी उदंडता देखी है। आज तुम्हारा विनय भी देख लिया।”

उन्होंने वरदान दिया—

“महायुद्ध में तुम्हें असंख्य घाव लगेंगे। जिन अंगों पर खीर लगी है, वे शीघ्र भर जाएंगे।”

फिर वे मुस्कराए।

“पर कृष्ण, तुमने अपने तलवों पर खीर नहीं लगाई। अच्छा ही हुआ। तुम्हें भी अंत का एक बहाना मिल जाएगा।”

कृष्ण ने जरा की ओर देखा।

“वे साधु स्वयं महादेव के अंश थे। तुम्हारा बाण उसी प्रसाद का माध्यम है।”

जरा कांपते स्वर में बोला,

“तो क्या संसार आपको खो देगा?”

कृष्ण शांत थे।

“संसार मेरे बिना भी चलता रहेगा। धर्म स्थापित हो चुका है। जब-जब अधर्म बढ़ेगा, कोई न कोई फिर आएगा।”

उन्होंने जरा के सिर पर हाथ रखा।

“अब जाओ मित्र। अपने मन पर बोझ मत रखो। तुम्हारा कल्याण हो।”

जरा चला गया। समुद्र की लहरें मौन थीं। वन स्थिर था।

और उसी शांति में—

एक युग समाप्त हो गया।

एक बहाने के साथ।